सीता जी की अग्नि परीक्षा का नतीज़ा तो परीक्षा लेने व देने वाले पहले से ही जानते थे।
बस दुनिया को नतीजा पता लगना था ।
परीक्षा तो अग्नि की थी – सत्य और कर्त्तव्य के बीच चयन करने की ।

राजमार्ग – राजा के द्वारा बनाया गया मार्ग,
सुविधाजनक, बहुतायत उस पर चलते हैं,
निष्कंटक,
सुंदर क्योंकि उस पर फूल बिछे रहते हैं,
बनाने में बहुत हिंसा होती है।
मोक्षमार्ग – भगवान/ गुरु के द्वारा निर्मित,
कठिन, बहुत कम इस पर चल पाते हैं,
कंटक युक्त,
उबड़-खाबड़,
पर अहिंसक, भविष्य निष्कंटक/ सुविधाजनक ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

चिड़िया भी मनुष्यों की तरह बच्चों का लालन पालन/सुरक्षा देती है पर उन्हें उड़ना सिखाती/उड़ जाने देती है ।
मनुष्य अपने बच्चों को पकड़े ही रखना चाहता है ।
इसीलिये चिड़िया आसमान में और मनुष्य धरती पर है ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

दिगम्बर वेश को देखकर, ज्यादातर को वैराग्य के भाव आते हैं, कुछ को विकार के ।
तो कपड़ा कुछ विकारी आंखों पर डालना तर्क संगत होगा या दिगम्बरत्व पर !

मुनि श्री महासागर जी

दान क्यों ?
पाप के प्रक्षालन के लिये ।
पापी कौन ? देने वाला या लेने वाला ?
कृतज्ञता कौन माने, देने वाला या लेने वाला ?
(जो कृतज्ञता न माने, वह पापी)

आचार्य श्री विद्यासागर जी

हम लक्ष्मी के स्वागत में सजावट करते हैं/दीप जलाते हैं/पटाखे चलाते हैं(पर भूल जाते हैं-प्रदूषण को,अहिंसा को)

दीपावली दो महान कार्यों के लिये मनायी जाती है-
1) महावीर भगवान ने सबसे बड़ा वैभव (समवसरण)छोड़ा।
2) श्री राम ने लंका जीत कर वहाँ का राज्य छोड़ा।
याने-हम लक्ष्मी को बुलाते हैं ताकि हमारा संसार बढ़े,
पर हमारे भगवानों ने लक्ष्मी को छोड़ा और पाया मोक्ष-लक्ष्मी को।

आप क्या चाहते हो?
संसार या संसार से मुक्ति
??

चिंतन

आज के समय में धर्म की प्रासंगिकता कितनी है ?

दु:ख में धर्म की ज़रूरत ज्यादा होती है/महत्त्व ज्यादा महसूस होता है।
पंचमकाल/कलयुग में दु:ख बढ़ते ही जा रहे हैं, सो धर्म की प्रासंगिकता बढ़ रही है ।

चिंतन

धर्म में ध्यान आवश्यक नहीं, सहायक है ।
ध्यान तो जानवर भी कर लेते हैं ।
धर्म तो आत्मज्ञान से होता है/आवश्यक है ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

नल बंद क्यों करें ! जब पानी आना बंद होगा तब नल अपने आप बंद हो जायेगा ।
हाँ ! जब ज़मीन में पानी समाप्त हो जायेगा तब सब कुछ अपने आप बंद हो जायेगा।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

एक व्यक्ति का चयन होना था ।
उसे भोज पर बुलाया गया, सूप आया, मालिक नमक डाल कर पीने लगा, उसने भी नमक मिलाकर पी लिया ।
मालिक ने उसे फ़ेल कर दिया ।
कारण ?
बिना परखे निर्णय लेना ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

सम्बंध शुरु होते हैं उत्साह के साथ पर समय के साथ नीरस होते जाते हैं ।
पढ़ाई में भी यही स्थिति, अन्य कामों में भी ।
यदि Final Exam को ध्यान में/Goal बनाकर पढ़ाई शुरु/आगे भी की जाय तो उत्साह बना रहता है ।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

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