पाप तो पहले भी होते थे; आज भी होते हैं।
फ़र्क ?
पहले सिर्फ़ बड़े पाप करते थे; आज वही  पाप छोटे भी करने लगे  हैं।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

मौसम के अनुसार हम पंखे की Speed को नियंत्रित करते रहते हैं।
क्रोधादि को क्यों नहीं करते ?
जबकि ताकतवरों के सामने/ ग्राहकों के सामने तो बहुत विनयशील हो जाते हैं !

चिंतन

मन बाहरी, इसीलिये बाहरी वस्तुओं से प्रभावित हो जाता है।
चित्त अंतरंग, संस्कार चित्त पर ही होते हैं, यह Hard Disk है, भाव चित्त से ही आते हैं।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

मन निषेध के प्रति आकर्षित होता है, यदि निषेध दूसरे के द्वारा आरोपित किया जाये तो।
खुद के द्वारा निषेध लगाने पर मन उधर नहीं जाता।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

आचार्य श्री विद्यासागर जी के विरुद्ध किसी ने पुस्तक छपवा दी।
मुझे (महाराज जी) बहुत बुरा लगा।
आचार्य श्री से आशीर्वाद मंगवाया जबाब देने के लिये ।
आचार्य श्री – आपको ऐसी पुस्तकें पढ़ने का समय कैसे मिला ?
क्या तुमने सारे धार्मिक ग्रंथ पढ़ लिये ?
धार्मिक ग्रंथ पढ़ने से क्रोधादि शांत होते हैं, ऐसी पुस्तकों को पढ़ने से क्रोधादि अशांत होते हैं।
मैंने (महाराज जी) आधी पुस्तक पढ़ी थी, आगे पढ़ना बंद करके रख दी।

मुनि श्री सुधासागर जी

तुलसीदास जी के एक भक्त अपने वैभव आदि का श्रेय गुरु को देते थे।
तुलसीदास जी – ये वैभव आदि तो पापियों के भी होते हैं, गुरु से तो वह प्राप्त करो जो पापी प्राप्त नहीं कर सकते।

सुत दारा औ लक्ष्मी, पापी के भी होय ।
संत समागम हरिभजन, तुलसी दुर्लभ होय ।।

1. तामसिक – दूसरों को सताने – मरणांतक
2. राजसिक – अहंकार पुष्टि – दीर्घकाल
3. सात्विक – दूसरों की भलाई के लिये – अल्पकाल

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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