“सत्यम् शिवम् सुंदरम्”
सत्य यही है कि जब तक शिव (आत्मा) है तभी तक सुंदरता है (शरीर की) ।
सो सुंदरता तो आत्मा की ही हुई न ! शरीर की नहीं ।

समर्पित इच्छाओं को श्रद्धेय के चरनों में समर्पित करता है, ज़िद्दी इच्छाओं की पूर्ती श्रद्धेय से कराना चाहता है, अपने जीवन को रद्दी बना देता है ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

विकलेंद्रिय (2 से 4 इंद्रिय) वाले (बिना कान के कीड़े) बोलते रहते हैं, सुनते नहीं हैं ।
यदि हम भी बोलते अधिक हैं, सुनते कम या नहीं* हैं तो हममें और कीड़ों में क्या फर्क रहा !

आचार्य श्री विद्यासागर जी

*अच्छी/हितकारी/गुरू/भगवान की वाणी

वीतराग/अहिंसा धर्म में पहले उपदेश साधु बनने का/ छोड़ने का होता है, क्योंकि इसमें निवृत्ति की प्रमुखता है ।
अन्य मत प्रवृत्तिआत्मक होते हैं ।

भगवान महावीर ने खुद के दर्शन करने को नहीं कहा, पूजादि करने को भी बाद में कहा; पहले खानपान की शुद्धता पर जोर दिया; जो जिंदा रखता है तथा ग़लत भोजन बीमारियाँ पैदा करता है । भोजन में भी पहले सामिष छोड़ने को कहा ।
धर्म पहले सावधान करता है, कर्म/ कोरोना वही सावधानियां बाद में करता/ करने को मजबूर कर देता है ।

मुनि श्री सुधा सागर जी

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April 8, 2022

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