रावण की ही नहीं, राम की भी,
वरना मृग सोने का हो सकता है क्या ?

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

इस और अगले जन्म को सार्थक बनाना ही जीने का उद्देश्य होना चाहिये ।

आ. श्री महाप्रज्ञ जी

इस जीवन को विषय-भोगों से वंचित रख कर अगले जीवन को बनाना बुद्धमतता है ।

श्री रायचंद्र जी

भावों की शुद्धि के साथ द्रव्य (शारीरिक) शुद्ध भी बहुत महत्वपूर्ण है,
तभी तो शरीर को अपवित्र होने से बचाने के लिये पद्मिनि आदि ने आहुति दी थी और सती का दर्जा पाया ।

मुनि श्री सुधासागर जी

शुरू के 20वर्ष test match खेलते रहे…गुणों के बढ़ने की रफ़्तार माशिअल्ला, अवगुणों के wickets भी गिरे उसी रफ़्तार से ।
अगले 20वर्ष oneday खेले, सुबह से शाम हो गयी ।
2020 में तो 20:20 का world-cup है…
अब तो speed बढ़ा लो !
भगवान/गुरु से प्रार्थना कर लो ।

चिंतन

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