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हित चाहने वाला पराया भी अपना है
और
अहित करने वाला अपना भी पराया है !

रोग अपनी देह में पैदा होकर भी हानि पहुंचाता है
और
औषधि वन में पैदा होकर भी हमारा लाभ ही करती है ।
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(अनुपम चौधरी)

पूरी जिंदगी लगा दी चाबी खोजने में,
अंत में पता चला कि ताला तो क्या, दरवाजे भी नहीं हैं…
परमात्मा के घर में ।

भीतर शून्य ! बाहर शून्य !! शून्य चारौ ओर है !!!
“मैं” नहीं है मुझमें, फिर भी “मैं-मैं” का ही शोर है ।

इसी तू-तू—मैं-मैं के चक्कर में भगवान के घर की ओर नज़र उठाने की फुर्सत ही कहाँ मिली !

(मंजू)

गांठ पड़ते ही धागादि छोटे हो जाते हैं ।
मन में गांठ पड़ते ही मन भी छोटा (खोटा) हो जाता है ।
यदि गांठ पड़ ही गई है तो जल्द से जल्द खोल लो ताकि original स्थिति बन जाये ।

क्या रिश्ते स्वार्थ पर आधारित होते हैं ?
रिश्ते स्वार्थ से नहीं बनते, स्वार्थ से तो टूटते हैं ।
जो स्वार्थ पर आधारित होते हैं, उन्हें रिश्ते कह ही नहीं सकते ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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