चित्त अचेतन,
मन चेतन ।
हालाँकि धर्म में इनको अलग अलग नहीं माना है ।
(कृपया comments भी देखें)
माला में धागा, मोती से ज्यादा महत्व रखता है, पर उसमें गठानें नहीं होना चाहिये वरना मोतीयों में बिंध नहीं पायेगा/ उनको बांधकर नहीं रख पायेगा ।
बिना ग्रंथियों तथा मज़बूत धागे में पिरोयी माला को पहनने को तो सब लालायित रहते हैं, पर खुद ग्रंथी रहित और मज़बूत बनना नहीं चाहते ।
समर्पण यानि इच्छाओं का अर्पण ।
समर्पण से नदी सागर बन जाती है ।
संसार में समर्पण उसे करें जो विश्वासघात ना करे, वह भी मर्यादा (रिश्तों की) के अंदर ही ;
परमार्थ में, जो मोक्षमार्ग पर आगे बढ़ाये ।
Kind Words are short and soft,
but their echoes are endless
ज़रूर कोई तो लिखता होगा…
कागज़ और पत्थर का भी नसीब…
वरना ये मुमकिन नहीं कि…
कोई पत्थर ठोकर खाये और कोई पत्थर भगवान बन जाये…
और…
कोई कागज रद्दी और कोई गीता बन जाये…!
????????(सुरेश)????????
मोह रूपी असावधानी से/अपनी ही सांसों से, अपना ही दीपक बुझ जाता है ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
धर्म आत्मा का स्वभाव है,
कर्म किये का फल ।
दोनों को अलग अलग रखें ।
धर्म तो मंगलाचरण हैं – कार्य करने से पहले, कार्य के दौरान और अंत में (चाहे परिणाम अनुकूल हो या प्रतिकूल) ।
मुनि श्री सुधासागर जी
अक्सर हार जाता हूँ…
उन लोगों से……
जिनके,
दिल में भी दिमाग होता है ।
????(अरविंद)????
पिंजरा तो खुल गया परंतु पंख ही न खुले तो क्या होगा ?
दीपक तो जल गया परंतु आँख ही न खुले तो क्या होगा ?
धर्म-शास्त्र के उपदेश तो अनेक सुन लिये, परंतु भीतर की गाँठें न खुले तो क्या होगा ??
सोच मनवा सोच !
(मंजू)
रिश्ते हों या बर्फ…दोनों को बनाने
और
बनाये रखने के लिये… ठंड रखनी बहुत जरूरी है ।
(सुरेश)
Life is 10% what you make it,
and
90% how you take it.
■ संसार के सब जीवों (मनुष्य, पशु, पेड़ पौधे) को unconditional क्षमा,
सब से unconditional क्षमा ।
■ “श्री” भगवान के नाम से पहले 1008 बार,
गुरु के 108 बार,
शत्रु के 4,
मित्र 3,
सेवक 2,
पत्नी/पुत्र 1
पं.जगमोहन लाल शास्त्री (मुनि श्री प्रमाण सागर जी)
●ब्रम्हचर्य
• पाँचों इंद्रियों के संयम को कहते हैं;
• स्त्रीयों के सम्मान में है;
• असुंदर/कुरूप के प्रति घ्रणा न होना ब्रम्हचर्य है ।
● ब्रम्हचर्य से क्षमता/शक्ति/आत्मविश्वास बढ़ता है ।
• राजा भरत चक्रवर्ती के भाग्य में हजारों रानियां थीं पर उन्हें हजारों की भूख नहीं थी ।
• हम तो हर वस्तु मनोरंजन के लिए ही लेते हैं चाहे वह भोजन हो, कपड़े या पति-पत्नी ही क्यों न हो ।
• अमीर न सही, अमीर बनने का विचार तो करते हो न !
तो ब्रम्हचर्य का क्यों नहीं ?
• जो विकारों को पूर्णता से नियंत्रण कर सकते हैं वे मुनि/साधु बनें,
जो नहीं रख सकते उन्हें एक पत्नि/पति व्रत तो लेना ही चाहिए ।
मुनि श्री अविचल सागर जी
• आकिंचन्य = किंचित भी मेरा नहीं ।
• पूर्ण त्याग के बाद जो बचा, वह आकिंचन्य ।
• बाज़ार में एक से बढ़कर एक दुकान पर आकिंचन्यी दूर से दूर ।
• आकाश और पृथ्वी पर सब क्रियायें होती रहती हैं पर वे अप्रभावित,
गहरी/शांत नदी और अहिमेंद्रों जैसे ।
• आकिंचन्य से आत्मा कंचन बन जाती है ।
आचार्य श्री विद्या सागर जी
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