इस युग में पाप ज्यादा या पुण्य ?
ज्यादा कैसे ??

उत्तर…
अंधे ज्यादा या दोनों आँखों से देखने वाले ?
अपाहिज कितने ? स्वस्थ कितने ?

मुनि श्री सुधासागर जी

(यहाँ आकर हम पुण्य से ज़्यादा पाप करते हैं)

बड़े नोट को खुलवाते नहीं, छुपाकर रखते हैं ।
ऐसे ही पुण्य – छोटे मोटे कामों के लिये खर्च मत करो,
उसका प्रदर्शन भी मत करो,                           
लक्ष्मी का प्रदर्शन नहीं/सरस्वती का प्रदर्शन सही है ।

आप अपनी अंतिम यात्रा की तय्यारी कर रहे हैं !

आप लोग मेरे शरीर की अंतिम यात्रा की ओर देख रहे हैं;
मैं संसार की अंतिम यात्रा की ओर, जो बहुत महत्वपूर्ण है ।
सो मुझे रागद्वेष कुछ नहीं दिख रहा है, सिर्फ सिध्द भगवान दिख रहे हैं ।
कर्म की अग्नि मुझे जला रही है, मैं ज्ञान और तप से कर्मों को ।
तुम लोग डूबते सूरज को देख कर रो रहे हो, मैं उगते सूरज को देख रहा हूँ ।
यहाँ के कामों को विराम, आगे के कामों की तय्यारी ।
पुण्य के उदय में गाफ़िल न हो जाउँ, सावधान हूँ ।
ॐ नमः सिध्देभ्यः

मुनि श्री चिन्मय सागर जी – 27.9.19

ज्यादातर चीजें समीप जाने पर बगैर मांगे मिल जाती हैं…
जैसे *बर्फ* के पास *शीतलता* ,
*अग्नि* के पास *गरमाहट*
और
*गुलाब* के पास *सुगंध* ,

तो भगवान् से मांगने के बजाये, निकटता बनाओ;
तब सब कुछ अपने आप मिलना शुरू हो जायेगा ।

????????आपका दिन मंगलमय हो

(सुरेश)

माला में धागा, मोती से ज्यादा महत्व रखता है, पर उसमें गठानें नहीं होना चाहिये वरना मोतीयों में बिंध नहीं पायेगा/ उनको बांधकर नहीं रख पायेगा ।
बिना ग्रंथियों तथा मज़बूत धागे में पिरोयी माला को पहनने को तो सब लालायित रहते हैं, पर खुद ग्रंथी रहित और मज़बूत बनना नहीं चाहते ।

समर्पण यानि इच्छाओं का अर्पण ।
समर्पण से नदी सागर बन जाती है ।
संसार में समर्पण उसे करें जो विश्वासघात ना करे, वह भी मर्यादा (रिश्तों की) के अंदर ही ;
परमार्थ में, जो मोक्षमार्ग पर आगे बढ़ाये ।

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