मान का न होना ।
मद = मान का नशा ।
मद 8 चीजों का—
जाति, कुल, ज्ञान, बल, रूप, तप, पूजा, ऋद्धि ।
मद के Lamination लगने के बाद सुधार बंद हो जाता है ।
मद से बचाव—
1) पश्चाताप
2) चिंतन
3) आँखों में प्यार/शांति
4) वाणी और स्पर्श में कोमलता
5) भगवान से commitment और प्रार्थना ।

मुनि श्री अविचलसागर जी

■ क्षमा से बैर नहीं रखना ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

■■ क्षमा कैसे करें ?
बस क्षमा करके, क्षमा करें / बैर छोड़ दें, उनसे भी जिनको पता ही नहीं कि आप उनसे बैर करते हैं ।
2) दुश्मनी निभाने के लिए भगवान को छोड़ने को तैयार हो !
(उनकी क्षमा करने की आज्ञा की अवहेलना करके)
आचार्य मानतुंग के भक्तामर में शक्ति, अपमानित करने वालों को क्षमा करने से ही आयी थी ।
3) यदि क्षमा करने की शक्ति नहीं है तो भगवान से प्रार्थना करो ।
4) यदि संसार में मेरा कोई नहीं, तो बैरी मेरा कैसे हो सकता है !

मुनि श्री अविचलसागर जी

????????महापर्व पर्युषण????????

नहीं उपवास कर पाओ,
तो तुम उपहास से बचना।
अगर दर्शन न हो संभव,
प्रदर्शन से ही तुम बचना।

कमी वंदन में रह जाये,
तो बंधन से ही बच जाना।
प्रवचन सुन न पाओ तो,
दुर्वचन से ही बच जाना।

केशलोचन न हो संभव,
क्लेश-लोचन ही कर लेना।
न भोजन छोड़ पाओ तो
भजन भी छोड़ मत देना।

न कर पाओ प्रतिक्रमण,
अतिक्रमण से बच जाना।
क्षमा गर माँग न पाओ
क्षमा करके ही तिर जाना।

न मीठे बोल कह पाओ तो
केवल मौन रह जाना।
कहे कोई अगर कड़वा,
उसे हँसके ही सह जाना।

निभा पाओ न रिश्तों को
तो उनको तोड़ मत देना।
किसी का हाथ तुम धरके,
राह में छोड़ मत देना।

(डॉ.पी.एन.जैन)

डॉक्टर के पर्चे को ना समझें/समझ आयेगा भी नहीं, डॉक्टर को समझो/डॉक्टर पर विश्वास करो ।
गुरु/भगवान की बातें तो कम ही समझ पाओगे सो गुरु/भगवान को समझो/उन पर विश्वास करो/उनकी बातों पर विश्वास करो ।

किसी ने कहा – “बचपन में बुढ़िया मर गयी”,
यानि !
मरने से कुछ साल पहले उसने धर्म में प्रवेश किया था ।
सावधान !!
हमारे मरने के बाद हमारे लिये सब यह ना कहें,
इसलिये समय रहते धर्म शुरू कर दें ।

शून्य का कोण 360 ड़िग्री यानि पूर्ण/पूर्णता का प्रतीक ।
इसे हीन (Zero) दृष्टि से ना देखें ।
व्यवहार में भी यह शून्य जिस अंक के अंग लग जाता है, उसकी कीमत दहाई, सैकड़ादि में बढ़ा देता है ।
जिसने संसार को शून्य कर लिया, उसने पूर्णता/निर्वाण को प्राप्त कर लिया ।

पुस्तक को आँखों के बहुत करीब रखने से पढ़ नहीं पाओगे तथा आँखों में भी दर्द होने लगेगा ।
सांसारिक संबंधों में भी उचित दूरी बनाये रखना दोनों के हित में होता है ।
(यह सावधानी गुरु तथा भगवान के साथ भी रखनी चाहिये)

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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