दादाजी ने नदी में देखा, पिता ने कुंए में , हमने नल में, हमारे बच्चों ने बोतल में, उनके बच्चे तो चित्रों में देखेंगे,
यदि हम नहीं जागे तो !

गोचरी-वृत्ति याने जैसे गाय नीचे मुँह करके/बिना इधर उधर देखे अपना भोजन करती रहती है ।
ऐसे ही साधु-प्रवृत्ति वाले भी अपने काम से काम रखते हैं ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

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