जिओ और जीने दो की सर्वोच्च साधना संलेखना में ही भायी जाती तथा की जाती है ।
(जीवों की रक्षा ना कर पाने पर देह त्याग करके )

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

यदि व्यक्ति विवेकी है तो उसे सत्संग की क्या आवश्यकता ?

इस प्रश्न के ज़बाब में गुरु ने जानवरों को बाँधने वाले खूँटे को हिलाने को बोला ।
वह मज़बूत था, हिल नहीं रहा था, पर जानवरों का मालिक आया और उस पर हथौड़ा मारा, तब जानवरों को उससे बाँधा ।
रोजाना मालिक ऐसा ही करता था ।
कारण ?
आज तो खूँटा मज़बूत है पर जानवर उसे ढ़ीला न कर दें ।

(डॉ. अमित राजा)

समर्पण = सम(सत्य)+अर्पण ।
अर्पण का दर्पण से गहरा संबंध है,
दर्पण यानि देखकर कर चलना ।
बीज समर्पण करता है तो वटवृक्ष, बूँद < सागर, जीव < परमात्मा बन जाता है ।

प्रवृत्ति – अहिंसा का पालन,
निवृत्ति – हिंसा छोड़ना,
व्रत – प्रवृत्ति/निवृत्ति में सहायक ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

डॉक्टरी में एक और महत्वपूर्ण शिक्षा दी जाती है – Case बिगड़ने पर Expert Specialist को कब/समय रहते बुलाना होगा ।

हमको भी यह मालूम होना चाहिये कि कब तक पुरुषार्थ के सहारे रहें और कब गुरु/भगवान की शरण में पहुँचना चाहिये ।

(डॉ. एस. एम. जैन)

गड्डे में गिरे व्यक्तियों में से पहले किसको निकाला जाता है ?

जो खड़ा होता है, फिर जो बैठा होता है, अंत में जो लेटा होता है ।

मुनि श्री विनिश्चयसागर जी

मूल्य त्याग का नहीं, त्याग को निभाने के लिये आप कितना मूल्य चुकाने को तैयार हैं, वह तय करता है कि त्याग बड़ा है या छोटा ।
वह तय करता है कि उसका फल बड़ा मिलेगा या छोटा ।

मुनि श्री सुधासागर जी

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