जैसे भगवान, वैसा मैं – अभिमान आयेगा, प्रगति का भाव नहीं होगा ।
जैसी चींटी, वैसा मैं – हीनता का भाव आयेगा ।
“जैसा मैं, वैसा मैं”…क्यों ना कहें !
भगवान बनने के काम करें, चींटी बनने वाले कामों से बचें ।

चिंतन

दीपक दो प्रकार से जलाया जा सकता है –
1. माचिस पर तीली रगड़ करके – पुरुषार्थ
2. जलते हुए दीपक के सामीप्य से – संगति

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

शिष्य के ऊपर कालिख लग जाये तो चलेगा,
पर कालिख लगा गुरु नहीं चलेगा,
वरना
शिष्य अपनी कालिख किस दर्पण में देखेगा !
ना ही शिष्य ऐसा काम करे कि गुरु के नाम पर कालिख लग जाये ।

मुनि श्री सुधासागर जी

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