क्या विदेशों के पेड़ ज्यादा हरे और ज्यादा घने होते हैं ?

नहीं, पर वे ज्यादा उगाते हैं/उनका रक्षण ज्यादा करते हैं ।
गुणों का भी यही स्वभाव है – कुछ लोग ज्यादा उगा लेते हैं/उनकी रक्षा करते रहते हैं, कुछ समाप्त कर लेते हैं ।

चिंतन

समस्या आने पर न्याय नहीं, समाधान होना चाहिये;
क्योंकि…
न्याय में एक के घर दीप जलते हैं,
लेकिन
दूसरे के घर अँधेरा होता है ।
मगर समाधान में…
दोनों के घर दीप जलते हैं ।

(सुरेश)

( विंगकमांडर अभिनंदन के लौटने से भारत में तो दीपक जलेंगे ही,पाकिस्तान के प्रति द्वेष की अग्नि भी कम होगी )

क्या 2 रोटी खाने वाले से 10 रोटी खाने वाले का पुण्य ज्यादा होता है ?
नहीं, यदि 2 रोटी खाने वाला, 10 रोटी वाले से ज्यादा तृप्ति अनुभव कर रहा है तो उसके पुण्य ज्यादा है ।

3 प्रकार का –                                                                        तामसिक – हर समय चिड़-चिड़ करते रहना,
राजसिक – अपना रौब बनाये रखने के लिये ,
सात्विक – सामने वाले की भलाई के लिये ,
इसमें प्रवृति बदल जाती है, समझाना भी आ जाता है ।

किसी व्यवसाय में खर्चा/परेशानी ज्यादा, कमाई /सुकून कम हो तो उसको बुरा कहोगे ना ?
संसार में भी सुख (सुखाभास) कम, दु:ख ज्यादा, इसलिये बुरा कहा ।

जो ज्येष्ठ बनने में लग जाते हैं, वे श्रेष्ठ नहीं बन पाते हैं ।
जो श्रेष्ठ बनने के प्रयास में लग जाते हैं, वे ज्येष्ठ भी बन जाते हैं ।

मुनि श्री  विनिश्चयसागर जी

संसार में सबसे ज्यादा प्रेम स्वयं से होता है,
इसके कारण ही व्यक्ति संसार की ओर भागता है,
तथा
संसार से दूर भी भागता है,
यहाँ तक की कुछ लोग आत्महत्या भी कर लेते हैं ।

जैसे भगवान, वैसा मैं – अभिमान आयेगा, प्रगति का भाव नहीं होगा ।
जैसी चींटी, वैसा मैं – हीनता का भाव आयेगा ।
“जैसा मैं, वैसा मैं”…क्यों ना कहें !
भगवान बनने के काम करें, चींटी बनने वाले कामों से बचें ।

चिंतन

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April 8, 2022

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