किसी व्यवसाय में खर्चा/परेशानी ज्यादा, कमाई /सुकून कम हो तो उसको बुरा कहोगे ना ?
संसार में भी सुख (सुखाभास) कम, दु:ख ज्यादा, इसलिये बुरा कहा ।

जो ज्येष्ठ बनने में लग जाते हैं, वे श्रेष्ठ नहीं बन पाते हैं ।
जो श्रेष्ठ बनने के प्रयास में लग जाते हैं, वे ज्येष्ठ भी बन जाते हैं ।

मुनि श्री  विनिश्चयसागर जी

संसार में सबसे ज्यादा प्रेम स्वयं से होता है,
इसके कारण ही व्यक्ति संसार की ओर भागता है,
तथा
संसार से दूर भी भागता है,
यहाँ तक की कुछ लोग आत्महत्या भी कर लेते हैं ।

जैसे भगवान, वैसा मैं – अभिमान आयेगा, प्रगति का भाव नहीं होगा ।
जैसी चींटी, वैसा मैं – हीनता का भाव आयेगा ।
“जैसा मैं, वैसा मैं”…क्यों ना कहें !
भगवान बनने के काम करें, चींटी बनने वाले कामों से बचें ।

चिंतन

दीपक दो प्रकार से जलाया जा सकता है –
1. माचिस पर तीली रगड़ करके – पुरुषार्थ
2. जलते हुए दीपक के सामीप्य से – संगति

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

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