कुटुम्ब दादाजी से नहीं, पिता पुत्र से चलता है ।
व्यापार को भी आगे चलाने के लिये नये नये Item लाये जाते हैं।

मुनि श्री सुधासागर जी

“भा” से भाव, “र” से राग, “त” से ताकत ।
जब कोई किसी को दास बनाता है, पहले उसका नाम बदलकर नया नाम रखता है, ताकि वह अपने को Meaningless मानने लगे जैसे भारत से India

श्री सदगुरु

श्रद्धा के दो भेद –
1. भावानात्मक झुकाव – संसार व परमार्थ दोनों में ।
2. प्रकट रूप को आदर्श मान हृदय में स्थापित, जिसे जीवन की डोर सोंप दें, प्राय: परमार्थ में ।

बीमारी में कई बार कहा जाता है कि कारण पता नहीं लग रहा,
उसे डॉक्टर की भाषा में Idiopathic(Idiot डॉक्टर, Pathic बीमार) कहते हैं ।
आप के दु:खों का कोई कारण ना हो तो उसे भी Idiopathic(Idiot कारण न समझने वाला, Pathic कर्मों से बीमार) कहेंगे ना !
पर बिना कारण के कार्य होता नहीं, सो दुःखों का कारण पूर्व के कर्म ही होंगे ना !!

डॉ.एस.एम.जैन

यदि –
1. व्यवहार में विनम्रता
2. वाणी में मधुरता
3. चित्त में सरलता
4. जीवन में सादगी
हो तो जीवन में पूर्णता आ जाती है ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

अच्छे लोगों की परीक्षा कभी न लीजिए,
क्योंकि वे पारे की तरह होते हैं;
जब आप उन पर चोट करते हैं तो वे टूटते नहीं हैं,
लेकिन फिसल कर चुपचाप आपकी जिंदगी से निकल जाते हैं ।

???????? सुरेश ????????

सत्याग्रही (सत्य के आग्रही) नहीं बनें, सत्यग्राही बनें — विनोबा
सत्य किसे मानें ?
वह सब सत्य है जो सच्चे देव, शास्त्र, गुरु के अनुकूल हो,
(अहिंसा/वीतरागता के अनुकूल हो)

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

साधु की भक्ति देख, प्रियजन डरते/चिड़ाते हैं कि साधु बन जायेगा, पर भगवान की भक्ति करते समय नहीं, ऐसा क्यों ?
क्योंकि साधु बनने की तो संम्भावना है जबकि भगवान बनने की नहीं ।

चिंतन

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