जो सम्बधियों से सम्बंध तुड़वाने में निमित्त बने, वह वासना;
जो सम्बंधों को बढ़ाये/द्रढ़ करे वह प्रेम ।
उत्कृष्ट पावनता स्वयं के पावन होने में नहीं बल्कि दूसरों को पावन करने में है ।
दो प्रकार –
1. नकारात्मक – किसी को ना मारना/सताना
2. सकारात्मक – दूसरों की सेवा/रक्षा करना
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
आ.श्री विद्यासागर जी ने आहार में एक पंड़ित जी के हाथ से कोई चीज़ नहीं ली पर दूसरे व्यक्ति से ले ली ।
पंड़ित जी नाराज़ – मैं तीन दिनों से देने की कोशिश कर रहा हूँ, आपने नहीं ली, इनसे क्यों ले ली ?
आ.श्री ने दूसरे व्यक्ति से पूछा…
आज तुमने आहार में क्या दिया था ?
याद नहीं ।
आ.श्री – पंड़ित जी! आप आहार देना नहीं चाहते थे,
बल्कि देखना चाहते थे कि मैं अमुक वस्तु लेता हूँ या नहीं,
जबकि ये व्यक्ति देना चाहते थे ।
मुनि श्री सुधासागर जी
अपराधी को सज़ा से पाप कर्म कट भी सकता है और बढ़ भी सकता है ।
(अपराधी की मनःस्थिति के अनुसार)
मान कम करने का एक कारगर तरीका…
जिस क्षेत्र में मान है, उस क्षेत्र के अपने से बड़े के सानिध्य में रहो।
भगवान/गुरु, वे नहीं जो भक्तों से राग करते हों, बल्कि वे जो दुश्मनों से द्वेष ना करते हों ।
जल भगवान पर ड़ाला जाता है, शीतलता भक्त को, विकार भक्त के धुलते हैं ।
जिसका अर्थ शुद्ध, वही सच्चे अर्थों में शुद्ध ।
(अर्थ = जो प्रत्यक्ष के पीछे छुपा रहता है/ अभिप्राय/ intention)
गाँधी जी की लाठी मारने के लिये नहीं थी,
बल्कि मार खाने पर उठने के लिये थी ।
हैसियत का कभी अभिमान न करना,
उड़ान ज़मीं से शुरू और ज़मीं पै ही खत्म होती है ।
(सुरेश)
ख्व़ाहिशों का राजपथ बहुत बड़ा और भीड़-भाड़ वाला होता है,
बेहतर यही है की हम,
ज़रूरतों की छोटी-छोटी गलीयों में मुड़ जाएँ !
???????? नीलम ????????
यदि आप के चंद मीठे बोलों से किसी का रक्त बढ़ता है तो यह भी रक्त-दान है,
यदि आप के द्वारा किसी की पीठ थपथपाने से उसकी थकावट दूर होती है तो यह भी श्रम-दान है।
यदि आप कुछ भी खाते समय उतना ही प्लेट में लें कि कुछ भी व्यर्थ ना जाए तो यह भी अन्न-दान है।
???????? स्वाति-भोपाल ????????
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