जो सम्बधियों से सम्बंध तुड़वाने में निमित्त बने, वह वासना;
जो सम्बंधों को बढ़ाये/द्रढ़ करे वह प्रेम ।

दो प्रकार –
1. नकारात्मक – किसी को ना मारना/सताना
2. सकारात्मक – दूसरों की सेवा/रक्षा करना

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

आ.श्री विद्यासागर जी ने आहार में एक पंड़ित जी के हाथ से कोई चीज़ नहीं ली पर दूसरे व्यक्ति से ले ली ।
पंड़ित जी नाराज़ – मैं तीन दिनों से देने की कोशिश कर रहा हूँ, आपने नहीं ली, इनसे क्यों ले ली ?
आ.श्री ने दूसरे व्यक्ति से पूछा…
आज तुमने आहार में क्या दिया था ?
याद नहीं ।
आ.श्री – पंड़ित जी! आप आहार देना नहीं चाहते थे,
बल्कि देखना चाहते थे कि मैं अमुक वस्तु लेता हूँ या नहीं,
जबकि ये व्यक्ति देना चाहते थे ।

मुनि श्री सुधासागर जी

यदि आप के चंद मीठे बोलों से किसी का रक्त बढ़ता है तो यह भी रक्त-दान है,
यदि आप के द्वारा किसी की पीठ थपथपाने से उसकी थकावट दूर होती है तो यह भी श्रम-दान है।
यदि आप कुछ भी खाते समय उतना ही प्लेट में लें कि कुछ भी व्यर्थ ना जाए तो यह भी अन्न-दान है।

???????? स्वाति-भोपाल ????????

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