भगवान दिखता है ? उसे छू सकते हो ?
नहीं
तो मानते क्यों हो ?
Sense दिखते हैं ? छू सकते हो ?
तो क्या आप Non-Sense हो ??
(डॉ.निकिता)
हथौड़ी कांच पर गिरे तो चकनाचूर, सोने पर गिरे तो चमक ।
हम क्या हैं ?
और
क्या बनना चाहते हैं ?
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
बालावस्था – ज्ञानार्जन,
युवावस्था – धनार्जन,
वृद्धावस्था – पुण्यार्जन

(सुरेश)
चन्द्रमा भी जब सूर्य के समय में अनाधिकार चेष्टा करके घुस आता है, तब निस्तेज हो जाता है ।
चिंतन
तुमसे मेरे कर्म कटे,
मुझसे तुमको क्या मिला ?
आचार्य श्री विद्यासागर जी
करने योग्य क्रियायें करना ही धर्म नहीं,
उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है, अकार्य को ना करना ।
भगवान के भरोसे क्यों बैठे रहते हो !
क्या पता भगवान आपके भरोसे बैठा हो ।
(प्रांजल)
गुरु-परम्परा के ऊपर आगम-परम्परा होती है ।
आगम-परम्परा में भी, सबसे पुरानी वाली को मान्य मानें ।
मुनि श्री सुधासागर जी
विकारी मृत व्यक्ति को भी सब कंधे पर उठा कर क्यों ले जाते हैं?
क्योंकि मृत्यु के बाद विकार समाप्त हो जाते हैं।

(Divya)
भक्ति का मापदंड़ विरक्ति है ।
सपनों के साथ पुरुषार्थ किया जाये तभी वे लक्ष्य में परिवर्तित हो पाते हैं ।
भोजन ना आत्मा करती है, ना शरीर ।
भोजन तो शरीर और आत्मा के बीच का Agreement है, साथ रहने का ।
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