स्कूल में तीन बकरी घुस आयीं, एक बच्चे ने उनपर 1, 2, 4, नं लिख दिये ।
सुबह तक उन बकरियों ने स्कूल में खूब गंदगी कर दी । सब ने मिलकर बकरियों को पकड़ कर बाहर कर दिया, पर उन्हें ‘3’ नं की बकरी नहीं मिली । सारी पढ़ाई बंद करके सब ढ़ूँढ़ने लगे, शाम हो गयी पर ‘3’ नं बकरी नहीं मिली ।

हम भी जीवन की शाम होने तक उस अज्ञात को ही खोजते रहते हैं/जिसमें सुख नहीं है, उसमें सुख खोजते रहते हैं ।

(डॉ.अमित)

घर में हवन हो रहा था । पति को घी डालना था और पत्नि को सामग्री।
दोनों बहुत थोड़ा-थोड़ा डाल रहे थे । हवन पूरा हो गया, बहुत सारा घी और सामग्री बच गयी।
अंत में पंड़ित ने कहा बचा हुआ घी और सामग्री हवन में डाल दो, कुछ बचाना नहीं चाहिये।
पूरा सामान डालते ही कमरा आग/धुँए से भर गया।

Moral : अनुपात से उपयोग करें । अंत में जो बचेगा उसे तो स्वाहा होना ही है।

(दिव्या)

भगवान की वाणी का अमृतपान करके भी जीवन में संतोष क्यों नहीं आ रहा है ?
अमृत पीने से संतोष आये ही, ऐसा नियम नहीं है पर अमृत पीने के बाद गंदा पानी नहीं पिया जायेगा, ऐसा नियम निश्चित है ।

मुनि श्री सुधासागर जी

Couplet by Urdu Poet Bashar –

उन्हें कामयाबी में सुकून नज़र आया
तो वो दौड़ते गए,
हमें सुकून में कामयाबी दिखी
तो हम ठहर गए !

ख़्वाईशों के बोझ में बश़र
तू क्या क्या कर रहा है..
इतना तो जीना भी नहीं
जितना तू मर रहा है…!

(डॉ.पी.एन.जैन)

तथ्य को जानने की इच्छा से किया गया तर्क, सुतर्क है/करने योग्य है ।
तर्क के लिये किया गया तर्क/सामने वाले को नीचा दिखाने/अपने को सही सिद्ध करने के लिये किया गया कुतर्क है/अवांछनीय है ।

अभाव दु:खदायी नहीं, अभाव की अनुभूति दु:ख देती है ।
सबसे ज्यादा अभाव में तो साधू रहते हैं, पर ना उनका अभाव उन्हें दु:खी करता है, ना औरों का सद्भाव,
बल्कि ये अभाव ही दूसरों पर प्रभाव ड़ालता है ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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