हर दर्द की दवा है इस ज़माने में साहब,
“बस”
किसी के पास कीमत नहीं, किसी के पास किस्मत नहीं..!!
???????? सुरेश ????????
सांसारिक सुख की तासीर –
1. समय/मात्रा/संख्या के साथ घटता है ।
2. सुख देने वाली वस्तु से अलगाव अवश्यंभावी होता है ।
3. सुख का अंत दु:खमय होता है ।
4. सुख क्षणिक होता है ।
जबकि धर्म का सुख इनके विपरीत होता है ।
मनोबल बढ़ाने के लिये –
1. रूढ़ियों से हटना होगा
2. दृष्टि को सच्चे रास्ते (देव, शास्त्र, गुरू) पर बनाये रखना
3. स्वाध्याय
4. सुसंगति करनी होगी
ऐसी बुद्धि वाले Valley की Shape को ही पहाड़ मानने लगते हैं (Shape तो”V” की ही है, उल्टी ही सही )
समय पर किया गया कार्य – सदुपयोग
समय निकल जाने के बाद किया गया कार्य – दुरुपयोग
अनुमान अप्रत्यक्ष, अनुभव प्रत्यक्ष ।
कभी कभी अनुमान अनुभव से ज्यादा कारगर हो जाता है, जैसे ज़हर खाने से मृत्यु हो जाती है ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
The PAST,the PRESENT and the FUTURE are really one: they are TODAY
माँ (श्रीमती मालतीदेवी) के देहावसान पर….
वेदन हो पर वेदना न हो,उसे निर्जरा (कर्मों को काटना) कहते हैं ।
लालमणी भाई
पाप – आंतरिक, अधर्म तथा भावनाओं से,
अपराध – प्रकट, क्षेत्र और काल से परिभाषा बदलती रहती है,
इसका फल बाद में निर्धारित किया जाता है, जबकि पाप का भावना के साथ ही ।
ज्ञानी की हर क्रिया में ज्ञान झलकता है – बोलने, चलने, देखने, सुनने में, चाहे परिस्थिति अनुकूल हो या प्रतिकूल, चाहे वस्तु अच्छी हो या बुरी ।
मुनि श्री सुधासागर जी
ज़िदगी के नियम भी कुछ
कबड्डी के खेल जैसे हैं ।
सफलता की लाइन टच करते ही,
लोग आपके पैर खींचने लग जाते हैं ।
???????? सुरेश ????????
कल्पना उसकी ही की जा सकती है जिसे कभी देखा हो ।
पत्थर की मूर्ति में यदि आज हम भगवान की कल्पना कर पाते हैं तो निश्चित मानिये – पिछले जन्मों में हमने भगवान के साक्षात दर्शन ज़रूर किये होंगे ।
वैज्ञानिक को अद्भुत (संसारिक) सिद्धांत मिल गया तो निर्वस्त्र होकर सड़क पर दौड़ता हुआ युरेका युरेका पुकारने लगा ।
दिगम्बर साधू को तो अद्भुत आत्मिक अनुभूति मिल जाती है, उसे कपड़ों की क्या सुधबुद !!
वह तो शरीर से भी अलग थलग हो जाता है ।
मुनि श्री सुधासागर जी
दो मित्र नित्य नदी पर जाकर डुबकी लगाते थे ।
Deal थी कि सिक्के पहले मित्र को मिलेंगे और सूरज (जिसका प्रतिबिम्ब नदी में दिखता था) दूसरे को ।
थोड़े दिनों में पहला तो धनवान हो गया और दूसरा पागल ।
क्या हम भी छाया रूपी खुशी के पीछे तो अपना जीवन बर्बाद नहीं कर रहे हैं !
चिंतन
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