थकावट तब आती है जब फुरसत होती है ।
लगातार परिश्रम करते समय तो थकावट पसीने में निकलती रहती है, चेहरे पर चमक आ जाती है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

नारी नदी है, फसल पैदा करने में मुख्य भूमिका निभाती है ।
लेकिन जब वासना की बाढ़ आ जाय तो उसी फसल को बर्बाद भी कर देती है ।
सारा कूड़ाकरकट अपने में समेट लेती है ।

हम बड़े हो रहे हैं या छोटे ?
उम्र घट रही है तो हम सावधान क्यों नहीं हो रहे हैं ??
स्टेशन पास आ रहा है तो सो क्यों रहे हैं ?
सामान समेटना क्यों नहीं शुरू कर रहे ??

जिस देह में समृद्ध आत्मा हो, उस देह को देवालय कहा है, दिवालिया देह को नहीं ।
आत्मा का दर्शन करना है तो दर्पण पर से धूल हटानी होगी, तभी वास्तविक स्वरूप दिख पायेगा ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

तालियाँ सुनने का भाव आये तो सोचना – उनको कैसा लगता होगा जिनको तालियाँ नहीं मिलतीं ।
दोनों हाथों से पुरुषार्थ करो तो दोनों हाथों से तालियाँ स्वत: ही बजेंगी ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

भगवान की भक्ति करते समय यदि कोई बैरी या प्रियजन दिख जाय तो क्या हमारा ध्यान उधर जाता है ?

यदि हाँ तो यह भगवान से ज्यादा आकर्षण रागद्वेष का सिद्ध हुआ ।

मुनि श्री सुधासागर जी

क्षुल्लक श्री गणेशवर्णी जी को एक सेठ ने बढ़िया दुपट्टा लाकर दिया ।
अगले दिन वर्णी जी ने वह एक गरीब बच्चे को दे दिया ।
सेठ – मुझे कह देते, मैं दूसरा ला देता ।
वर्णी जी – ऐसा बढ़िया थोड़े ही ला देते ।

राम को ईशांतराज (भील) “तू” से संबोधन कर रहे थे ।
लक्ष्मण को अच्छा नहीं लगा ।
राम ने कहा – इन्होंने अपनी (भक्त) और मेरे (साध्य) बीच की दूरी समाप्त कर ली है ।
भाषा से ज्यादा भाव महत्वपूर्ण होते हैं ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

मंदिर में टूटी हुई वस्तु नहीं रखी जाती तो टूटा हुआ मनुष्य क्यों जाता है ?
टूटी हुई वस्तु जुड़ नहीं सकती, पर टूटा हुआ मनुष्य जुड़ सकता है ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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