निकलता है, हर सुबह
एक नया सूरज;
यह बताने के लिए कि
उजाले बांट देने से
उजाले कम नहीं होते !
????????एकता????????
जब जल गंदा हो जाता है
तो उसे हिलाते नहीं, शांत छोड़ देते हैं ,
धीरज रखते हैं…….,
गंदगी अपने आप नीचे बैठ जाती है….
साफ जल अपने आप ऊपर आ जाता है…..
इसलिये जो धीरज रख सकता है,
वह अपना इच्छित सब कुछ पा सकता है….
स्पीडब्रेकर कितना भी बड़ा हो,
गति धीमी करने से झटका नहीं लगता ।
उसी तरह मुसीबत कितनी भी बड़ी हो,
शांति से विचार करने पर, जीवन में झटके नहीं लगते ।
???? सुरेश ????
डॉक्टर के पास दर्शनार्थी बनकर जाओगे तो इलाज नहीं हो पायेगा, शरणार्थी बनने पर ही लाभ होगा ।
ऐसे ही गुरु/भगवान के पास शरणार्थी बनकर जाने में ही लाभ होगा ।
वृद्धावस्था में अशक्ति के साथ-साथ(ज्यादातर) आसक्ति भी हो जाती है ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी

(Pranjal)
सच्ची प्रीति – अंगातीत;
सच्चा संगीत – संगातीत (जो आत्मा से मिला दे) ।
विचारों/भावनाओं को नियंत्रित करना कठिन है, क्रियाओं को आसान ।
पर भावनायें और क्रियायें आपस में Connected रहती हैं ।
सो क्रियाओं में प्रसन्नता दर्शायें, चिंतायें/भावनायें अपने आप सुधर जायेंगी ।
(श्रीमति शर्मा)
जोकर अपने आपको कलाकार मानता है, पर दुनिया जोकर ! ऐसा क्यों ?
क्योंकि उसका आचरण जोकर जैसा है ।
इसीलिये दुनिया को हंसाता है/दुनिया उस पर हंसती है, पर वह कभी नहीं हंस पाता ।
सबसे बड़ा बैरी = “अपुरुषार्थ”
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
सम्पर्क = तेल-पानी,
संबंध = दूध-पानी,
संगति = आग-पानी या पानी-सोड़ियम ।
धन होने पर धनी कहलाते हैं, ज्ञान होने पर ज्ञानी !
पर ज्ञान तो कीड़े मकोड़ों को भी होता है ?
उनका ज्ञान गुजारे भर के लिये होता, जीवन निर्माण के लिये नहीं ।
पहले ज्ञानी बनो, फिर उसका चिंतन करो, तब अनुभूति होगी ।
मुनि श्री समयसागर जी

(सुरेश)
धर्मानुराग – धर्म के प्रति ऐसा अनुराग जो विपत्ति में भी बना रहे ।
गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी
(अंधानुराग – अधर्म को भी धर्म का नाम देकर अनुराग/श्रद्धा सहित करना,
संसानुराग – आत्मा का अहित करनेे वाले संसारियों से अनुराग बनाये रखना)
कर्तृत्व (कर्ता) का भाव, कर्तव्य से विमुख कर देता है ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
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