कितना महफूज़ था गुलाब,
काँटों की गोद में….

लोगों की “मोहब्बत” में,
पत्ता-पत्ता बिखर गया….!

अरविंद

पाप से भी बड़ा पाप है – “पाप को स्वीकार ना करना” ।
स्वीकार करते ही वह प्रायश्चित बन जाता है, तप कहलाता है ।
अंजन चोर भी निरंजन बन जाता है ।

पुण्य से भी बड़ा पुण्य है – “अपने आप को पापी कहना” ।

मुनि श्री सुधासागर जी

थकावट तब आती है जब फुरसत होती है ।
लगातार परिश्रम करते समय तो थकावट पसीने में निकलती रहती है, चेहरे पर चमक आ जाती है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

नारी नदी है, फसल पैदा करने में मुख्य भूमिका निभाती है ।
लेकिन जब वासना की बाढ़ आ जाय तो उसी फसल को बर्बाद भी कर देती है ।
सारा कूड़ाकरकट अपने में समेट लेती है ।

हम बड़े हो रहे हैं या छोटे ?
उम्र घट रही है तो हम सावधान क्यों नहीं हो रहे हैं ??
स्टेशन पास आ रहा है तो सो क्यों रहे हैं ?
सामान समेटना क्यों नहीं शुरू कर रहे ??

जिस देह में समृद्ध आत्मा हो, उस देह को देवालय कहा है, दिवालिया देह को नहीं ।
आत्मा का दर्शन करना है तो दर्पण पर से धूल हटानी होगी, तभी वास्तविक स्वरूप दिख पायेगा ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

तालियाँ सुनने का भाव आये तो सोचना – उनको कैसा लगता होगा जिनको तालियाँ नहीं मिलतीं ।
दोनों हाथों से पुरुषार्थ करो तो दोनों हाथों से तालियाँ स्वत: ही बजेंगी ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

भगवान की भक्ति करते समय यदि कोई बैरी या प्रियजन दिख जाय तो क्या हमारा ध्यान उधर जाता है ?

यदि हाँ तो यह भगवान से ज्यादा आकर्षण रागद्वेष का सिद्ध हुआ ।

मुनि श्री सुधासागर जी

क्षुल्लक श्री गणेशवर्णी जी को एक सेठ ने बढ़िया दुपट्टा लाकर दिया ।
अगले दिन वर्णी जी ने वह एक गरीब बच्चे को दे दिया ।
सेठ – मुझे कह देते, मैं दूसरा ला देता ।
वर्णी जी – ऐसा बढ़िया थोड़े ही ला देते ।

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