कितना महफूज़ था गुलाब,
काँटों की गोद में….
लोगों की “मोहब्बत” में,
पत्ता-पत्ता बिखर गया….!
अरविंद
गुरूर में इंसान को कभी इंसान नहीं दिखता,
जैसे
छत पर चढ़ जाओ,
तो
अपना ही मकान नहीं दिखता ।
नीलम
सत्य को ख्व़ाहिश होती है…
कि…
सब उसे पहचानें
और
झूठ को हमेशा डर लगता है…
कि…
कोई उसे पहचान न ले ।
मंजू
पाप से भी बड़ा पाप है – “पाप को स्वीकार ना करना” ।
स्वीकार करते ही वह प्रायश्चित बन जाता है, तप कहलाता है ।
अंजन चोर भी निरंजन बन जाता है ।
पुण्य से भी बड़ा पुण्य है – “अपने आप को पापी कहना” ।
मुनि श्री सुधासागर जी
थकावट तब आती है जब फुरसत होती है ।
लगातार परिश्रम करते समय तो थकावट पसीने में निकलती रहती है, चेहरे पर चमक आ जाती है ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
नारी नदी है, फसल पैदा करने में मुख्य भूमिका निभाती है ।
लेकिन जब वासना की बाढ़ आ जाय तो उसी फसल को बर्बाद भी कर देती है ।
सारा कूड़ाकरकट अपने में समेट लेती है ।
न अपेक्षा,
न उपेक्षा !
(सुरेश)
हम बड़े हो रहे हैं या छोटे ?
उम्र घट रही है तो हम सावधान क्यों नहीं हो रहे हैं ??
स्टेशन पास आ रहा है तो सो क्यों रहे हैं ?
सामान समेटना क्यों नहीं शुरू कर रहे ??
जिस देह में समृद्ध आत्मा हो, उस देह को देवालय कहा है, दिवालिया देह को नहीं ।
आत्मा का दर्शन करना है तो दर्पण पर से धूल हटानी होगी, तभी वास्तविक स्वरूप दिख पायेगा ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
तालियाँ सुनने का भाव आये तो सोचना – उनको कैसा लगता होगा जिनको तालियाँ नहीं मिलतीं ।
दोनों हाथों से पुरुषार्थ करो तो दोनों हाथों से तालियाँ स्वत: ही बजेंगी ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
दिन की शुरूआत मंदिर से करने वाले प्राय: अपना ईमान मंदिर में ही छोड़ जाते हैं ।
भगवान की भक्ति करते समय यदि कोई बैरी या प्रियजन दिख जाय तो क्या हमारा ध्यान उधर जाता है ?
यदि हाँ तो यह भगवान से ज्यादा आकर्षण रागद्वेष का सिद्ध हुआ ।
मुनि श्री सुधासागर जी
विकास विनाश के मूल्य पर नहीं ।
क्षुल्लक श्री गणेशवर्णी जी को एक सेठ ने बढ़िया दुपट्टा लाकर दिया ।
अगले दिन वर्णी जी ने वह एक गरीब बच्चे को दे दिया ।
सेठ – मुझे कह देते, मैं दूसरा ला देता ।
वर्णी जी – ऐसा बढ़िया थोड़े ही ला देते ।
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