बहुत ग़ज़ब का नज़ारा है, इस अजीब सी दुनिया का,
लोग बहुत कुछ बटोरने में लगे हैं, खाली हाथ जाने के लिए…
(धर्मेंद्र)
मोह में स्वाभिमान रह नहीं सकता ।
अभिमान को ही स्वाभिमान मान लेते हैं ।
सम्मान की इच्छा रखना अभिमान है,
ऐसे कार्यों से बचना, जिससे अपमानित ना होना पड़े, यह स्वाभिमान है ।
एक शिष्य रोज़ाना पूछता था – आत्मा/परमात्मा प्रत्यक्ष दिखाओ ।
एक दिन, ऊपर से कुछ भारी वस्तु उसके ऊपर आ गिरी, उसके मुँह से आ निकला – “हे प्रभु, बचाओ” ।
गुरु – जिसने पुकारा वह आत्मा, जिसे पुकारा वह परमात्मा ।
दिख गए दोनों !!
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(श्रीमति शर्मा)
गुण का सत्कार करें, अवगुण को परिष्कृत करें ।
दु:खों को स्वीकारें, दोषों का प्रतिकार करें ।
भूखे को भोजन, थोड़ी देर को साता देता है,
पर उपवास का महत्त्व समझा दो, तो हमेशा के लिये पीड़ा हर जाती है ।
भगवान की भक्ति में कष्ट नहीं होता बल्कि दु:ख/पीड़ा का हरण हो जाता है ।
भक्ति सहने की शक्ति देती है ।
शिष्य उपवास करना चाहता है, गुरु ने आज्ञा नहीं दी,
तो पुण्य उपवास में ज़्यादा या आहार करने में ?
गुरु-आज्ञा में ज़्यादा पुण्य है ।
सरलता याने लचीला, मृदुता, निश्छलता ।
वे अड़ते नहीं, सो लड़ते नहीं ।
मन, वचन, काय में सादगी/शुद्धता/दिखावा नहीं ।
खाने, पीने, पहनावे में सात्विकता ज़रूरी ।
विश्वास : आदर्श पर विश्वास करके अपना कल्याण कर लेने का विश्वास,
अंधविश्वास : आदर्श ही मेरा कल्याण कर देगा ।
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(Br.Sanjay)
बिना ज्ञान, परम्परागत धर्म से लाभ सूक्ष्म होता है ।
भगवान की वंदना करते हुए सब पक्षी नृत्य करने लगे, पर मोर ने अपने प्रिय पंखों का विसर्जन किया ।
पंख यानि पक्ष यानि अहंकार का विसर्जन ।
सुधारने से नहीं, (ख़ुद) सुधरने से सुधरते हैं ।
ऐसे सुधरे मुड़ जाते हैं,
फिर मुड़कर नहीं देखते हैं ।
क्षु. श्री ध्यानसागर जी
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