समाजवाद में सुविधायें एक सी हो सकती हैं, पर स्वास्थ्य/स्वभाव कर्मानुसार ।
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(डा.अमित राजा)
द्रढ़ता, स्थिरता, निर्विकारता ही भगवत्वता प्रगट करने में निमित्त हैं ।
संसारी जीव करुणा करते हैं, निमित्त के सहारे से ।
गुरु/भगवान करुणामय रहते हैं, उनको निमित्त की ज़रूरत नहीं;
इसलिए अच्छे बुरे निमित्त का उन पर प्रभाव नहीं पड़ता ।
इहभव और परभव के कल्याण के लिये….
कर्म-फल की परवाह करना,
(जैसे ये करने का क्या फल होगा,
ये ना करने का क्या फल होगा)
कर्मसिद्धांत की परवाह करना है ।
पांड़वों की माँ वनवास में भी साथ रहीं,
कौरवों की माँ ने उनके साथ रहकर भी उन पर नज़र तक नहीं डाली ।
मीठे पानी की नदी खारे समुद्र में क्यों गिरती है ?
महत्त्वाकाँक्षा की वजह से,
ऐसे व्यक्तियों का हश्र भी ऐसा ही होता है,
अपना अस्तित्व खो देते हैं ।
सबको अपने अपने गुणों को बढ़ाना चाहिए ।
जानवर विजातियों को दूध पिलाते हैं, मनुष्य जेठानी, देवरानी के बच्चे को नहीं ।
शक्कर तो सबके कपों में होती है, कुछ उसे घोल लेते हैं (जीवन में),
कुछ ज़िंदगी भर फीकी चाय ही पीते रहते हैं, शक्कर बची रह जाती है, बरबाद हो जाती है ।
गुण/अवगुण तो सबमें होते हैं,
पर धर्म से गुणों में स्थिरता आती है जैसे दूध का दही बन जाता है।
धर्म अवगुणों से ऊपर उठा देता है जैसे मक्खन ऊपर आ जाता है ।
चिंतन
भाव सहित बिना माला (उँगलियों पर) के भी मालामाल हो सकते हैं ।
भाव रहित सोने की माला फेरने से भी सूने रह सकते हैं ।
गाय को पानी/दाना दो, तो दूध मिलता है ।
साँप को दूध पिलाओ, तो ज़हर मिलता है ।
नीचे से ऊपर (वालों साधु आदि) का अनुमान गलत ही होगा,
ऊपर से नीचे देखने पर तो चक्कर आ जाते हैं ।
सही एहसास/अनुमान समान धरातल पर आने पर ही होता है ।
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