पहला धन्यवाद परमात्मा को जो हमारे आदर्श और लक्ष्य है।
2) गुरु को जिन्होंने बताया परमात्मा कौन होते हैं और उन तक कैसे जाया जा सकता है।
3) माता-पिता को जिन्होंने साधन उपलब्ध कराये।
4) साधर्मी भाइयों को जिन्होंने उस रास्ते पर चलने में मेरा साथ दिया।
अंतिम स्वयं को कि आपने इन चार का लाभ उठाने का साहस किया।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 10 जून)

मैच्योर/ पॉजिटिव थिंकिंग किस अवस्था में ?
मुनि अवस्था में।
रियलिस्टिक थिंकिंग किस उम्र में‌ ?
ओल्ड/ वृद्धावस्था में। ऐसा व्यक्ति वृद्धाश्रम जाते समय भी कर्मसिद्धांत स्वीकार लेता है।
ऐसा कौन जो वृद्ध भी हो और महान संत भी ?
आचार्य श्री विद्यासागर जी।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 9 जून)

संसारी माँ बच्चों को लोरी सुलाने के लिये सुनाती है।
धर्म-माँ* बड़ों को जगाने के लिये।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

*जिनवाणी (धार्मिक ग्रंथ)/ गुरु-वाणी।

इस वर्तमान ऋतु में पित्त का प्रकोप बहुत होता है। उससे बचने के लिए खटाई (किसी भी तरह की चाहे वह नींबू की हो या कच्चे आंवले की। अगले माह में भी नहीं), उड़द, बीन्स, मिर्च/ मसाले, तेल नहीं लेना चाहिए। हाँ ! सूखा आंवला ले सकते हैं जो कसैला होता है।
गुड़, शीतल अनाज जैसे ज्वार, केले, अनार, लौकी लेना चाहिए

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 17 सितम्बर)

प्राय: दूसरों से अधिक से अधिक सुख लेना चाहते हैं। जैसे मिठाई मेरी थाली में है पर Common में से पहले और ज्यादा से ज्यादा लेना पसंद करते हैं/ लेते हैं।
अनात्मा की ओर ही लगे रहते हैं इसीलिये अपनी आत्मा की ओर आ नहीं पाते।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

प्रॉब्लम कंप्रोमाइज क्यों नहीं हो रही ?
कारण ?
एनालाइज नहीं किया, यदि एनालाइज किया भी था तो रियलाइज़ नहीं किया होगा। अगला कदम एक्सरसाइज, फिर भी कंप्रोमाइज नहीं हो रही तो मिनिमाइज हो ही जाएगी, जो अभी तक क्रिटिसाइज़ की जा रही थी।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 3 जून)

मेहमान ने 8 पूड़ी खाने के बाद बोला – बस! अब रहने दो, 8 पूड़ी हो गयीं।
मेजबान – वैसे तो 12 हो गयीं पर गिनता कौन है! और लें।
हमारा उपयोग ऐसा तो नहीं?

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

ध्यान आदि शुभ काम करते समय अशुभ भाव क्यों आते हैं और उनको दूर कैसे किया जा सकता है ?
पूरा समय मीठा खाने के साथ यदि कुछ खट्टा खा लिया तो डकार खट्टी आती है। ऐसे ही दैनिक जीवन के कामों में आये अशुभ भाव शुभ पर भारी पड़ जाते हैं।
समाधान… खट्टा खाना/ विकारी भावों से दूर रहें।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 3 जून)

आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे…
बांध-बांध कर क्यों रखना !
जब ख़ुद को बंध कर जाना ही है।
अर्थी पर भी, कर्मों से भी बँध कर।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

एक खगोलविद सड़क पर चलते-चलते तारों को देखे जा रहा था।
खुले गटर में गिर गया।
आसमानी संभावनाओं / ज्ञान से पहले ज़मीनी हक़ीक़तों को जानना जरूरी होता है।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

शिविर में हम कितने धार्मिक हैं उससे ज्यादा ज्ञान यह प्राप्त किया होगा कि हम कितने अधार्मिक थे।
धीरे-धीरे शिविर की सीखें कम होंगी पर कुछ को पकड़ कर रखना होगा। उसके लिए जरूरी है सजग/ सतर्क रहना।
देखना होगा कि सुविधाओं के छोड़कर सुकून ज्यादा था या लौट कर उनको भोगने में। यह रियलाइज़ करने के बाद एनालाइज करें और एक्सरसाइज करें।
धार्मिक क्रियाओं में संजीदगी को बढ़ाना होगा।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस/ जिंदगी से दूर रहकर अपना आत्मविश्वास बनाए रखना होगा; परजीवी बन कर न रह जाएँ।
भगवान ना सही गुणवान बनें, गुणवान बनने के लिए गुणगान करना होगा/ गुणों का ध्यान और अज्ञान का ज्ञान आवश्यक है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 8 सितम्बर)

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