“वक़्त” हर “वक़्त” को “बदल” देता है,
सिर्फ, “वक़्त” को थोड़ा “वक़्त” दो !
The more we use,
the more we want.
उम्मीदों से बंधा एक ज़िद्दी परिंदा है इनसान ,
जो घायल भी उम्मीदों से है,
और
ज़िंदा भी उम्मीदों पर है ।
(मंजू)
हरिवंशराय बच्चन जी की एक ख़ूबसूरत कविता,
“रब” ने नवाज़ा हमें ज़िंदगी देकर,
और हम “शौहरत” माँगते रह गये ।
ज़िंदगी गुज़ार दी शौहरत के पीछे,
फिर जीने की “मोहलत” माँगते रह गये ।।
2) ये समुंदर भी दुनिया की तरह खुदगर्ज़ निकला,
ज़िंदा थे तो तैरने न दिया मर गए तो डूबने न दिया
3) जो सामने है उसे लोग बुरा कहते हैं,
जिसको देखा नहीं उसे सब “ख़ुदा” कहते हैं ।
(सुरेश)
व्यक्ति की चाल……
धन से भी बदलती है,
और
धर्म से भी !
जब धन संपन्न होता है,
तब अकड़ कर चलता है;
और
जब धर्म संपन्न होता है
तब
विनम्र होकर !!
(डा.अमित)
When it is the darkest,
observe the stars.
आईना साफ़ किया तो “मैं” नज़र आया,
“मैं” को साफ़ किया तो “तू” नज़र आया ।
(नीलम)
The secret of happiness is to admire without desiring.
गरीबों के बच्चे भी खाना खा सकें त्यौहारों में,
इसलिये भगवान खुद बिक जाते हैं बाज़ारों में ।
(ब्र.नीलेश भय्या)
भगवान, गुरु, शास्त्रों से;
माँ और बड़ों से, उनके बताये हुए मार्ग पर न चल पाने के लिये;
अपने आप से, जीवन सही तरीके से न जी पाने के लिये;
संसार के सब जीवों से, जाने/अनजाने में हुई ग़लतीयों के लिये;
क्षमा भाव ।
2) रूठे सुजन मनाइए, जो रूठे सौ बार,
रहिमन फिरि फिरि पोइए, टूटे मुक्ता हार ।
(ब्र.निलेश भय्या)
3) दिल में बसी नफ़रत को मिटा देना भी,
एक स्वच्छता अभियान है ।
(आर.के.गुप्ता)
आत्मा में रमना ही सच्चा ब्रम्हचर्य है ।
प्रवचन पर्व (आ.श्री विद्या सा.जी)
2) बेटे और पति के शरीरों पर हाथ रखने से जब एकसा महसूस हो तब पूर्ण ब्रम्हचर्य मानें ।
गुरुवर मुनि श्री क्षमा सा.जी
“यह मेरा है”
ऐसे भाव का त्याग करना ही आकिंचन्य धर्म है ।
2) मछली पानी के बाहर आने पर मरने का एक कारण आक्सीजन की अत्यधिक मात्रा भी होती है, मनुष्य भी शुध्द आक्सीजन नहीं ले सकता ।
वैभव की अधिकता भी हमारे लिये ऐसा ही कारण बन जाती है ।
मोह को छोड़कर संसार, देह और भोगों से उदासीन परिणाम रखना त्याग धर्म है ।
बारसाणुवेक्खा-78
2) दान और त्याग में अंतर –
* दान प्रवृत्ति है , त्याग निवृत्ति ।
* दान शुभ भाव है, त्याग शुद्ध भाव ।
* दान स्वर्ग का कारण है, त्याग मोक्ष का कारण ।
* दान साधन है, त्याग साधना ।
* दान बहिरंग है, त्याग अंतरंग ।
* दान असमझ पूर्वक हो सकता है किन्तु त्याग समझ पूर्वक ही होता है ।
* दान आंशिक दिया जाता है, त्याग पूर्ण का होता है ।
* दान श्रावक करता है, त्याग मुनियों के द्वारा ।
इच्छा का निरोध ही तप है ।
या
अपेक्षा निरोध: तप: ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
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