प्राय: धार्मिक जन पाप-पुण्य/नरक-स्वर्ग की बातें करते हैं ।
ज्ञानी, पाप-पुण्य से परे, मुक्ति की ।
मुनि श्री सौम्यसागर जी
इन दोनों में महत्त्वपूर्ण कौन ?
गुरू पर Attack करने वाले से बचाने वाला युद्ध करता है – क्रिया दोनों Same, पर भाव अलग अलग;
सो एक को पुण्य, दूसरे को पाप ।
ज़ुबान यदि कठोर बोलने के लिये बनी होती,
तो नियति उसमें हड्डी तो ड़ाल देती ।
भगवान/गुरु का कहा कर ना पाओ तो ना सही,
कम से कम वो तो मत करो, जिसकी उन्होंने मनाही की है (जिसे उन्होंने पाप कहा है) ।
बड़ा परिवार, घर छोटा – दु:ख का कारण,
छोटा परिवार, घर बड़ा – दोष का कारण ।
बुद्ध ने एक रोगी, वृद्ध और एक मृत को देखा और वे प्रबुद्ध हो गये,
हम रोज़ देखते हैं, हमें वैराग्य क्यों नहीं हो रहा है ?
क्योंकि वे बुध्द थे और हम बुद्धू हैं ।
जो मंदिर से जुड़ता है, वो सिर्फ़ धर्म से ही नहीं, अपितु समाज और अपनी संस्कृति से भी जुड़ा रहता है ।
धर्म ना कुछ देता है, ना कुछ लेता है,
बस मिलने/छिन जाने पर स्थिरता देता है ।

(सुरेश)
मर्यादाओं का वहन बाह्य है, ज़रूरी है,
पर अपने को सीमित ना करें, यह आन्तरिक प्रक्रिया है, नुकसानदेह है क्योंकि आपकी क्षमताऐं तो असीमित हैं ।
समस्या का समाधान …
बलवान – शक्ति से, पर बाह्य, अस्थायी ।
बलहीन – भक्ति से, आन्तरिक, बाह्य भी और स्थायी ।
मन का स्वभाव सकारात्मक है ।
उसे मना करोगे तो वह मानेगा नहीं, उसे बताओ कि उसे क्या करना है, वह करेगा ।
तब मन के माध्यम से इंद्रियों को भी नियंत्रित कर सकते हो ।
क्षु. श्री ध्यानसागर जी
पाप का प्रकटीकरण अपराध है ।
अपराध बाह्य है, इस पर नियंत्रण देश का कानून करता है ।
पाप आन्तरिक है/निजी है तथा इस पर नियंत्रण धर्म करता है ।
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