स्याही की भी मंज़िल का अंदाज़ देखिये….
खुद-ब-खुद बिखरती है, तो दाग़ बनाती है ।
जब कोई बिखेरता है,
तो अलफ़ाज़…बनाती है !
(अरुणा)
अच्छे व्यत्ति की तलाश छोड़, खुद को अच्छा बनायें;
ताकि बहुत से व्यत्तियों की तलाश पूरी हो जाये ।
जिसकी नहीं बनी घर में,
वो क्या करेगा वन में !
(अरुणा)
तूफानों में पेड़ों की जड़ें गहरी और मज़बूत हो जाती हैं ।
इतना आसान नहीं ,
जीवन का किरदार निभा पाना ।
इंसान को बिखरना पड़ता है ,
रिश्तों को समेटने के लिए ।
जितना बड़ा “प्लोट” होता है उतना बड़ा “बंगला” नहीं होता,
जितना बड़ा “बंगला” होता है उतना बड़ा “दरवाजा” नहीं होता,
जितना बड़ा “दरवाजा” होता है उतना बड़ा “ताला” नहीं होता,
जितना बड़ा “ताला” होता है उतनी बड़ी “चाबी” नहीं होती ।
परन्तु “चाबी” का पूरे बंगले पर अधिकार होता है।
इसी तरह मानव के जीवन में बंधन और मुक्ति का आधार सूक्ष्म मन की चाबी पर ही निर्भर होता है।
(अपूर्व श्री)
हम भगवान को रोज आज़माते हैं,
पर भगवान हमको कभी नहीं आज़माता कि हममें इंसानियत है या नहीं ।
(मंजू)
एक बार अंगूर ????????????खरीदने के लिए एक फल बेचने वाले के पास रुका..
पूछा:
क्या भाव है गुच्छों???????????????????????????? का ?
बोला :
80 रूपये किलो ।
पास ही कुछ अलग-अलग टूटे हुए अंगूरों के दाने पड़॓ थे ।
मैंने पूछा :
क्या भाव है इन का ?
वो बोला :
30 रुपये किलो
मैंने पूछा :
इनका इतना कम दाम क्यों..?
वो बोला :
साहब, हैं तो ये भी बहुत बढ़िया
पर अपने गुच्छे से टूट गए हैं ।
मैं समझ गया कि अपने संगठन/समाज और परिवार से अलग होने पर हमारी कीमत आधे से भी कम रह जाती है।
एकता में बल है ।
(अरविंद)
आदमी साधनों से नहीं, साधना से,
भवनों से नहीं, भावना से,
उच्चारण से नहीं, उच्च-आचरण से श्रेष्ठ बनता है ।
(अरुणा)
हार जाओ, पर हारे मत रह जाना ।
रास्ता रुक जाये, पर रुके मत रह जाना ;
(Diversion ले लेना, पर पीछे मत भागना)
जीत जाओ, पर जीते मान कर खुशियाँ मत मनाते रह जाना ।
लोभ को अभी जीतने का प्रयास करें-
क्योंकि
“मानव जब बूढ़ो भयो, तृष्णा भई जवान”
(धर्मेंद्र)
ज़िंदगी जब भी लगा
कि तुझे पढ़ लिया ।
तूने अपना एक पन्ना
और खोल दिया ।
(मंजू)
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