जीवन विकास के 10 दिवसीय शिविर के समापन पर संबोधन करते हुए कहा… व्यवस्थाएं चुस्त भी, सुस्त भी रहीं पर कुल मिलाकर मस्त रहीं।
अपने को अनाड़ी खिलाड़ी बताते हुए, जिसने ना कोचिंग ली, ना पहले प्रैक्टिस ली,पर अपने सबके विकास के पीछे एक नेपथ्य नायक हैं जो पर्दे के पीछे से सब कुछ संभाल रहे थे जैसे कठपुतली को नाचते समय पीछे कलाकार होता है और उनका नाम है आचार्य श्री विद्यासागर जी।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 7 सितम्बर)

जो आत्मा में विचरण करता, वह इंद्रियों के विचलन से बचता। इंद्रियों की दासता समाप्त होते ही आत्मा में विचरण शुरू हो जाता।
देर तक जगने वाले(समय माफिया) के विचार, विकारों में परिवर्तित होने लगते हैं।
आचार्य श्री विद्यासागर जी के हजारों ब्रह्मचारियों देखकर एक वैज्ञानिक दल ने कहा कि ब्रह्मचर्य संभव ही नहीं और यदि है भी तो उन्होंने दवाओं से अपने विकारों को दबा दिया होगा। उत्तर देते हुए कहा… हाँ दवा तो लेते हैं पर आचार्य विद्यासागर की अध्यात्म और वैराग्य की औषधि।
जो विकारों से हार जाते वही हार्मोन्स की बात करते। 10,10 उपवास करने वालों से पूछो, क्या उनकी भूख 3 दिनों के बाद दवाओं से दब गई थी ?

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 6 सितम्बर)

“कुछ भी मेरा नहीं” होने के भाव को ही आकिंचन्य कहते हैं। हल्का होना ऊपर उठना सिखाता है, बाह्य तथा अंतरंग धारणाओं से भी।
एक व्यक्ति समुद्र के रास्ते व्यापार करके बहुत सोना लेकर वापस आ रहा था। रास्ते में तूफान आया और उसने अपनी जान बचाने के लिए सारा सोना समुद्र में फेंक दिया। स्वर्ण से तो रीत गया पर आयु रीत नहीं पाई।
आज शिक्षक दिवस भी है। शिक्षा वही जो मुक्ति में सहायक हो और मुक्ति के लिए रीतना भी ज़रूरी है। आज की शिक्षा कलेक्शन ऑफ़ इनफार्मेशन है जबकि होना चाहिए था करेक्शन ऑफ़ इनफॉरमेशन और उसके लिए जरूरी है कनेक्शन होना।
आज का नियम था दृष्टि संयम,आई कांटेक्ट से बचना यानी नज़रें झुका कर रखना जो कोमलता प्रदान करता है और कर्म के कांटेक्ट से बचाता है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 5 सितम्बर)

राग धूप है तथा त्याग छाँव। त्याग तो अवश्यम्भावी है,स्ववश किया तो आनंद परवश किया तो छटपटाहट। आचार्य ज्ञान सागर बताते थे… जो त्याग परवश किया जाता है वह उल्टी जैसा है, परेशानी देने वाला और स्ववश जैसे दैनिक क्रिया में, वह सुकून देने वाला।
आज शिविरार्थियों को नियम दिया है… सब तरह के रसों का त्याग, नीरस उबला भोजन करने का, उससे ही वस्तु का असली स्वाद आता है। यदि उसको 32 बार चर्वण करके खाया जाए तो मिष्ठान से भी ज्यादा स्वाद आता है। जिव्हा पर रखा हुआ नियंत्रण, जीवन पर नियंत्रण बन जाता है। सामने वाला बांधेगा तो बंधन,‌ दबाव/ असहजता लगेगी। स्वयं तो संयम, भावों में निर्मलता आती है। हीरा ऊपर का त्याग करता है तो चमकदार कीमती बन जाता है।
कभी भाव आया कि हम किसी बुराई का त्याग करें और करने पर यदि आनंद आया तो सोचा कि कोई और बड़ी बुराइयों का करें !

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 4 सितम्बर)

कर्मों को क्षय करने के लिए जो किया जाए उसे तप कहते हैं।
गृहस्थों के लिए आजकल एक बड़ा तप है… सुबह जल्दी उठना। निशाचर कोई राक्षस नहीं होता। जो रात को देर तक जागता है, वह होता है। ज्योतिष शास्त्र में रात्रि के प्रहरों को राक्षस, निशाचरयोग, रुद्रकाल जैसे नाम दिए गए हैं। जो रात को देर तक जागते हैं उनका झुकाव व्यसनों की तरफ जल्दी होता है, प्रकृति के विपरीत विकृति में रहते हैं।
रात को कुछ एकाग्रता वाला काम करना है तो 2:00 बजे तक जगने की जगह 2:00 बजे उठकर क्यों नहीं कर सकते !
पहले तप का नाम है प्रायश्चित। गुरु के सामने ना कर पाओ तो कम से कम लिख लो, बाहर तो निकलेगा।
जीवन का विकास तभी शुरू होगा जब आप अपने आप को एक दिन में वचनों से तीन बार और मन से हर समय अधार्मिक और अज्ञानी मानेंगे।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 3 सितम्बर)

फिटकरी का केमिकल फार्मूला,K2SO4.AI2(SO4)3.24H2O है। इतना कठिन सूत्र कितने सालों के बाद याद कैसे रहा ? लिखने लिखते ही आता है लिखने का हुनर, बच्चे शुरुआत में कॉपियां गंदी करते तो हैं। कॉपी गंदी होने के डर से क्या लिखते का अभ्यास न करें ! बिना लिखे कॉपी साफ तो रहेगी पर क्या वह किसी काम आएगी ? बार-बार लिखा तो दिमाग में रहेगा और एक बार लिखकर रख दिया या दोबारा देखा नहीं तो दीमक के काम आएगा।
जीवन की गाड़ी कीचड़ रूपी संसार में जब फंस जाती है तो कठोरता के संयम रूपी पत्थर डाल कर निकाल लेते हैं।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 2 सितम्बर)

क्रोध, लोभ, भय और हँसी को त्यागने तथा शास्त्र के अनुसार वचन बोलने पर ही सत्य कहा जा सकता है।
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहा करते थे कि सत्य साबित करने का नहीं, महसूस करने का है वरना उसकी अनुभूति नहीं हो सकती।
आज सोशल मीडिया ने सत्य की धज्जियाँ उड़ा दी हैं।
सत्य को उजागर करने की हट ने उसको अजगर बना दिया है जो मुँह खोल अनेक को लील रहा है, होना था सत्य में लीन।
हमारे वंश में पंचशील सिद्धांत था। अब हमारे अंश ही उसे विध्वंस कर रहे हैं।
एक शिष्य झूठ बहुत बोलता था। गुरु ने 1 साल तक किस्से कहानी (किससे का हानि) से सत्य की तालीम दी। आश्रम छोड़ते समय गुरु ने पूछा यदि तुमको नोट से भरा हुआ थैला मिल जाए तो क्या करोगे ? सत्य बोलने का संकल्प लिया है, अगर कोई नहीं देख रहा होगा तो मैं उस थैली को उठा लूंगा।
गुरु… सत्य बोलना तो सीख गए पर सत्य निष्ठा तुमसे दूर है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 1 सितम्बर)

संतोष से निरुत्साह नहीं, क्योंकि संतोष उत्साह और उमंग की पूर्णता है।
पास में रखी वस्तु जब बोझ लगे तब बोध में संतोष आता है। लोभी को तो जो वस्तु पास में है भी नहीं वह भी आकुल व्याकुल करती है।
आप भी पहले अनावश्यक वस्तुओं से विराम लें क्योंकि अनावश्यक‌ व्याकुलता ज्यादा पैदा करती हैं। कोरोना के दौरान समाचार आया कि अनावश्यक वस्तुओं का व्यापार कम होने से अर्थव्यवस्था चरमरा गई।
चारों कषाय इंटरचेंजेबल हैं, एक को कम करने का प्रयास करो दूसरी उभर आती है, तराजू में मेंढकों को तोलने जैसा है।
जब लोभ ज्यादा आए तब पास में रखी वस्तु में से कुछ दान कर दें।
संसारी संसारी से डरता है की वह उसका लाभ/ लोभ कम कर देगा जबकि सन्यासी संसार से डरता है।
लोभ को धर्म की तरफ डायवर्सन करना होगा जैसे कमर्शियल लैंड को कॉलोनी में डाइवर्ट कर देते हैं।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 31 अगस्त)

जितना आडंबर ज्यादा, उतनी उलझनें बढ़ती हैं।
एक बार बाहर दिखाने का क्रम बन गया फिर वह दिखावा आपकी मजबूरी बन जाता है। दिखावे वाले पर दुनिया विश्वास नहीं करती और दुनिया चलती विश्वास से ही है।
व्यक्ति की असली पहचान तब होती है जब उसको विश्वास हो जाता है कि उसे कोई देख नहीं रहा।
सरल दिखाना आसान है बनना कठिन, सरल बननेे के लिए बहुत कठिनाइयाँ झेलनी पड़ती हैं, तब आप दीवार से देवालय बन सकते हैं यदि अंदर का देव जागृत हो जाए तो।
शिष्य बननेे के लिए आडंबरों/ बहुरूपीपने को छोड़ना पड़ेगा।
हमारे रोल तो बहुत हैं पर आडंबर छोड़ने पर हम एक रोल मॉडल बन जाते हैं।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 30 अगस्त)

मान रूपी बीज को जब माटी में मिलायेंगे तब सम्मान रूपी वृक्ष तैयार होगा।
मेरा अपमान न हो जाए इसकी तो बहुत चिंता, पर मैं अपमान योग्य ना हो जाऊँ इसका ध्यान नहीं।
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे… कोई देखे तो लज्जा आती, मर्यादा टूटने से ना।
निरीक्षण करते रहें… हमारा मान दूसरों के अपमान की ओर जा रहा है या दूसरे को मान देने की ओर !
हमारे पूर्णांक मजबूरी में कम हो सकते हैं पर पुण्य की कमी मंजूरी से ही।
बुद्धि में मान रखने वाला बुद्धू कहलाता है।
यदि कोई आपकी बार-बार आलोचना कर रहा हो तो दो पट्टियाँ बनाओ। हर बुराई सुनने पर पहली पट्टी में गांठ लगाते जाओ। जब पहली पट्टी गांठों से भर जाए तो देखें…पहली की लंबाई कम हो गई। क्या आप चाहते हैं, आपकी लंबाई कम हो ! पर दोनों का वजन बराबर होगा क्योंकि गांठों में आपने अपनी कोई धरणा नहीं रखी।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 29 अगस्त)

जो नज़रें झुकाए चलते हैं, दुनिया उनको नज़रें उठाए देखती है जैसे आचार्य श्री विद्यासागर जी जब हावड़ा ब्रिज से निकल रहे थे उनकी नज़रें झुकी हुई थीं, दुनिया की नज़रें उन पर झुकी हुई थीं।

क्षमा की चोट क्रोध पर भारी पड़ती है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 28 अगस्त)

क्रोध “पर” को जीतने के लिए किया था लेकिन “पर” ने हरा दिया।

क्षमा मांगने से निर्भय होते हैं,
करने से निर्भार।

अनुसंधान जब अतिसंधान बन जाता है तब सत्य, सत्याग्रह आंदोलन के रूप में परिवर्तित हो जाता है। तब सत्य पर ग्रहण लग जाता है, सत्य का ग्रहण नहीं होता।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 29 मई)

आचार्य श्री विद्यासागर जी से पूछा – इतनी सर्दी में आप बिना कपड़ों के कैसे सह लेते हैं ?
आचार्य श्री – गर्मियों में गर्मी जमा कर लेते हैं।
(गर्मी सहने से शरीर सर्दियों में भी सह लेता है।)

(अर्चना जैन – ग्वालियर)

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