अपने माता पिता को छोड़कर पड़ौसी के माता पिता की सेवा करना, ऐसा ही है जैसे आत्मा को छोड़कर शरीर की सेवा करना ।

चिंतन

कोयल अपनी भाषा बोलती है इसलिये आज़ाद रहती है ।
किंतु तोता दूसरे कि भाषा बोलता है इसलिए पिंजरे में जीवन भर गुलाम रहता है।

अपनी भाषा,अपने कर्म और अपने आप पर विश्वास करो।

(अंजना)

हम मोह में दरख़्तों की
तरह हैं…
जहाँ लग जायें वहीं मुद्दतों
खड़े रहते हैं…

(अरविंद)

बिना ये परवाह किये कि वहाँ हमारे हिस्से का खाद पानी बचा है या और दरख्त़ों ने समेट लिया है ।

जो ताला चाबी को एक
ओर घुमाने से बन्द होता है,
वही दूसरी और घुमाने से
खुल भी जाता है।

हम अपने विचार,
वाणी और व्यवहार
को इस तरह घुमाऐं
क़ि कुरीतियों पर बन्द पड़े
ताले सही दिशा में खुल जायें ।

पतंग को मालूम तो है कि उसका जीवन छोटा सा है,
कब समाप्त हो जायेगा यह भी ज्ञात नहीं !
अंत कचरे के ड़िब्बे में ही है ।

यह सब जानते हुए भी, हर एक साथी पतंग को काटने के लिये दौड़ती रहती है,
और काटने के बाद आसमान में इठला-इठला कर झूमती रहती है !!

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