व्यवस्थित लोगों के लिये किसी (बाह्य) व्यव्स्था की ज़रूरत नहीं होती ।

मुनि श्री पूज्यसागर जी

एक व्यक्ति ने अपने दुश्मन की तीव्र आलोचना एक पत्रिका में बिना अपना नाम दिये छपवा दी।
कुछ दिनों बाद आलोचक पर भारी आर्थिक संकट आ गया।
दूसरे व्यक्ति ने उसकी आर्थिक सहायता की पर अपना नाम नहीं बताया ।
पहले व्यक्ति के नाम न बताने का कारण पूछने पर उसका जबाब था-
तुमने भी तो आलोचना में अपना नाम नहीं दिया था न !

सुख की परिभाषा –
डाक्टर/ बीमार – शरीर की निरोगता
ज्योतिषी – घटनाओं की अनुकूलता
धर्म – परोपकार/ त्याग/तप।

तो सच्चा सुख क्या ?

जो –
1) स्थायी
2) अंत सुखमय
3) लगातार बढ़ने वाला
4) दूसरों को भी सुख देने वाला
हो।

धर्म का प्रभाव क्यों नहीं हो रहा ?

क्योंकि हम जीवन में धर्म का अभाव महसूस नहीं करते हैं ,
इसलिये धर्म जानने/ समझने के भाव नहीं बनते,
बिना भाव के धर्म का प्रभाव कैसे होगा !

पता कैसे चले कि धर्म का प्रभाव हो रहा है ?
जब धर्म स्वभाव बन जाय ।

चिंतन

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