अपने को आत्मा मानोगे तो परमात्मा मिलेंगे,
शरीर मानोगे तो शरीर मिलेंगे / मिलते ही रहेंगे ।

चिंतन

संवेदनशील ही सत्संग में जाकर सद्भावनाओं को परिष्कृत करता है ।
उससे आत्मशुद्धि कर, सिद्धि को प्राप्त करता है ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

संसार रूपी किताब के हम पन्ने हैं।
मृत्यु ,पन्ना पलटना है, किताब से अलग होना /फटना नहीं।
पन्ना पलटने पर, उस पर लिखा उपयोगी याद करें/याद रखें।
दुःख आदि अनुपयोगी भूल जायें।

चिंतन

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