खुशियाँ बटोरते बटोरते उम्र गुजर गयी, पर खुश ना हो सके ।
एक दिन अहसास हुआ, खुश तो वो लोग हैं जो खुशियाँ बाँट रहे हैं ।

(श्री संजय)

“मृत्यु” शब्द भयभीत लोगों की ईज़ाद है ।
जब जन्म ही नहीं हुआ तो मृत्यु कैसे !!

यह तो बस यात्रा है, इसीलिये पुराने लोग मृत्यु को “गुज़र गया”, “देहांत”, “देहावसान” कहते थे ।

ब्र. नीलेश भैया

कमल कीचड़ में पैदा होता है, कीचड़ में बढ़ता है, पर कीचड़ से निर्लिप्त रहता है ।
हम लोग भी संसार में पैदा होते हैं, संसार में ही बड़े होते हैं पर सिर्फ ज्ञानी लोग ही संसार से निर्लिप्त रहपाते हैं ।

महात्मा गौतम बुद्ध

देशप्रेम के भाव न रखने से कर्मबंध क्यों ?

जैसे माता-पिता, धर्म, गुरू का आप पर उपकार है, ऐसे ही देश का भी है ।
यदि उपकार के बदले अपकार करेंगे तो कर्मबंध तो होगा ही ।

चिंतन

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