पुण्योदय : साधूजन को कोई भी अपशब्द नहीं कहता.
पापोदय + पुण्योदय : साधारणजन को कोई कोई अपशब्द कहता है,
पापोदय : भिखारी को हर कोई अपशब्द कहता है ।

चिंतन

किसी ने कहा – तुम  “भीतर”    जाओ,
आचार्य श्री ने कहा – तुम “भी तर” जाओ ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

गांव में रहो तो वैसी ही भाषा, वैसा ही आचरण हो जाता है, शहर की बात तो कर लेते हैं पर वैसी भाषा और आचरण नहीं कर पाते हैं ।
एक बार शहर में आ गये तब वहाँ जैसा व्यवहार आदि होने लगता है तथा गांव की याद भी नहीं आती है ।
यही संसार और वैराग्य में होता है ।

ब्र. नीलेश भैया

मोक्ष है भी या नहीं ?
संसार छोड़ दें और मोक्ष हो ही नहीं तो ?

आचार्य श्री – अमृत है या नहीं, पर क्या ज़हर खाते रहोगे ?

आचार्य श्री विद्यासागर जी

कमल खिलता है सूर्य के निमित्त से, बढ़ता है कीचड़ के निमित्त से,
वही कमल यदि धर्म रूपी ड़ंठल से अलग हो जाये तो वही सूर्य उसे सुखाने और कीचड़ उसे गलाने में निमित्त बन जाते हैं ।

आचार्य श्री विभवसागर जी

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