How strange it is …….

We wish to wear high fashion brand,
but feel comfortable in dirty, old jeans.

we wish to own big cars but enjoy ourselves only while walking down a road……

Life is indeed simple,
but we make it complex by running after thing that never give us joy……

(Mr. Dharmendra)

साधु संगति की महिमा दूध पानी जैसी है,
पानी दूध के साथ मिलकर दूध के भाव ही बिकने लगता है ।

मुनि श्री कुन्थुसागर जी

(पर दूध में ज़्यादा पानी मिलाने पर, दूध को सब थू थू करने लगते हैं )

दान से हमारे खाते में पुण्य नहीं पहुँच पाता,
मात्र कुछ पाप धुल पाते हैं ।

क्योंकि पुरूष ढेरों पाप करते हैं, धन कमाने में,
स्त्रियाँ ढेरों पाप करतीं हैं, घर के काम काजों में ।

एक शेर पेड़ के ऊपर बैठे बंदर को कैसे खा जाता है ?

शेर ने बंदर की परछांयी पर दहाड मार कर हाथ मारा तो बंदर डर कर नीचे गिर गया और शेर खा गया ।

हम भी वैभव, परिवारजन रूपी छाया को अपना मान कर दु:खी हो रहे हैं ।

एक शराबी नदी के किनारे बैठा था । वहीं एक राजा की सेना ने पड़ाव ड़ाला – हाथी, घोड़े आदि ।
शराबी बहुत खुश हुआ ।
सुबह सेना जाने लगी तो शराबी रोने लगा – मेरा ठाट बाट खत्म हो गया ।

हम सब भी परिवार आदि को पास देख खुश और जाने पर दुखी होते हैं ।
जबकि सब अपने कारणों से आते हैं और काम पूरा होने पर चले जाते हैं ।

विदेश में बहुत दिन रह आओ, तो क्या वह आपका घर कहलायेगा ?

संसार में कितने दिन भी भटक लो, पर उसे घर मत मानने लगना, घर तो हम सबका धर्म की शरण ही है, मोक्ष ही है ।

चिंतन

  • पर्युषण पर्व के 10 दिनों में जो विशुद्धता आयी, उससे क्षमा के भाव बनते हैं।
  • सही तरीका तो यह है कि जिनसे पिछ्ले दिनों में बैर हुआ है, उनसे बुजुर्ग लोग मन मुटाव को दूर करायें या हम स्वयं अपने मन मुटाव को दूर करें ।
  • श्री रफी अहमद किदवई (केन्द्रिय मंत्री) की अपने मित्र से नाराजगी हो गयी, मित्र ने अपने लड़की की शादी में उन्हें नहीं बुलाया पर वे अपने परिवार सहित उपहार लेकर पहुँच गये और मन मुटाव सौहार्द में बदल गया ।
  • क्रोध कम समय के लिये होता है,
    बैर लंबे समय के लिये होता है ।
    गुरुजन कहते हैं कि बैर क्रोध का अचार है ।
  • जो कर्म पूरब किये खोटे, सहे क्यों नहीं जीयरा ।
    आचार्य श्री विद्यासागर जी नित्य प्रवचन में कहते हैं जो मेरा अपकार कर रहा है वह (आत्मा) तो दिख नहीं रहा है,
    जो दिख रहा है (शरीर) वह अपकार कर नहीं सकता ।
    तो मैं बुरा किसका मानूं ?
  • धर्म की अनुभूति के लिये सबसे पहले बैर आदि दूर करने होंगे ।

पं. रतनलाल बैनाड़ा जी – पाठ्शाला (पारस चैनल)

  • क्षमा भाव मन में रमें,
    सत्य सरलता साथ,
    शुभ मंगलमय जीवन में,
    प्रभु भक्ति के भाव ।

माँ ( श्रीमति मालती जी)

हमने हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी बड़ी धूमधाम से पर्युषण महापर्व मनाया और उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य धर्मों को अपने जीवन में यथाशक्ति अंगीकार किया, क्यों न अगले 365 दिन भी हम यथाशक्ति 10 धर्मों के साथ जीवन जियें और इस तरह जीवन व्यतीत करते हुये जीवन के अंत समय में समाधिमरण पूर्वक इस नश्वर देह का त्याग करें ।

श्री संजय

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