प्राय: हम उन पर उपकार करते हैं जिन्होंने पहले हम पर उपकार किया हो।

  • यदि सभी यही सोचेंगे तो उपकार करने की पहल कौन करेगा ! श्रृंखला शुरु कैसे होगी !!
  • पूर्व उपकारी का उपकार करके तो हमने कर्जा़ चुकाया। आगे हमारा उपकार हो उसका बीजारोपण तो हुआ ही नहीं।

चिंतन

ज्ञान की प्रमाणिकता जानने का साधन ?
चारित्र।
तभी तो कहा है → बिना अभ्यास ज्ञान विष समान। चारित्र ज्ञान की भाषा है।
कुलीनता/ अकुलीनता, कुटिलता/ सरलता, पवित्रता/ अपवित्रता की पहचान भी चारित्र से ही होती है।

ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया

क्या वास्तु दोष भगवान के मंदिरों पर भी प्रभाव डालते हैं ?
वास्तु का अर्थ है भवन और मंदिर भी एक भवन ही है।
ग्वालियर के नए बाजार मंदिर में क्या वास्तुु दोष थे व पत्थर का वैभवशाली क्यों ?
1) मुख्य प्रवेश दक्षिण-पश्चिम में था।
2) मूलनायक प्रतिमा व अन्य प्रतिमाओं का मुख आग्नेय(अग्नि) कोण में था।
3) वॉशरूम(शौचालय) मंदिर की इमारत से चिपटा था।
4) कहीं पर भी, कुछ भी छोटा-मोटा निर्माण कर दिया गया था। जिससे भुजादोष लगता है जैसे लूला आदमी। 5) शिखर में दरारें पड़ गईं थीं। 6) पानी टपकता था।
7) सपोर्ट देने के लिए गर्डर लगाए जा रहे थे।
पत्थर का मंदिर इसलिए बनवाया जा रहा है ताकि हजारों साल चल सके क्योंकि 150-200 साल पुराना मंदिर बदलने का मानस और मौका जल्दी-जल्दी नहीं आता हालांकि करोड़ों वाली कार 2,4 वर्षों में बदल लेते हैं।
मंदिर वैभवशाली इसलिए ताकि संसारी रागी लोग आकर्षित हो सकें।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान- 10 अप़ैल)

प्रतिक्रमण में श्रमण अपने को जड़ बुद्धि, पापी आदि से संबोधित करता है पर श्रावक उन्हें ज्ञानी और पुण्यात्मा आदि कहते हैं।
यही तो अनेकांत है AND ‌‌‌‌एंड जबकि एकांत में END एंड।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 11 अ‌‌प्रैल)

  1. युद्ध में हवाई जहाज गोलियाँ खाकर लौटे।
  2. सोच → जहाँ गोलियाँ लगीं उन स्थानों को और मजबूत किया जाय।
  3. सम्भावना → जो प्लेन लौटकर नहीं आये उनको गोलियाँ अन्य स्थानों पर लगी होंगी। उन स्थानों को मजबूत किया जाय।

सीख दोनों से लेनी चाहिये, सफलता तथा असफलता।

ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया

मंत्र दो प्रकार के →

  1. उपासना मंत्र → इसमें किसी उपास्य का नाम नहीं, अपनी आलोचना नहीं, मात्र वंदना भाव (जैसे णमोकार)।
  2. बीज मंत्र → प्रकट अर्थ नहीं पर बहुत से अर्थ छुपे रहते हैं। जैसे “ओम् ह्रीं” अलग-अलग अर्थों के साथ उसे लगाकर अलग अर्थ निकलते हैं।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

एक ही पेय पीकर एक को लगा “काफ़ी”, दूसरे को “फीका”।
ऐसे कुछ को जीवन भी “काफ़ी” लगता है, अन्यों को “फीका”।
फीके की परिभाषा है → इच्छित से कम मिठास। जैसे अंबानी को फेरारी फीकी लगती है।

ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया

दूसरों के प्राणों की रक्षा से पहले अपने प्राणों का सम्मान करें।
भगवान की मूर्ति भी प्राण प्रतिष्ठा के बाद पूज्य बनतीं हैं।
हम पूज्यता चाहते हैं तो अपने प्राणों को प्रतिष्ठित करें।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

ये तन तेरा कोयला, धो-धो काला होय।
तप अग्नि में गर जले, चाँदी-चाँदी होय।।

घड़ा अग्नि में तप कर ही पानी को शीतलता प्रदान कर पाता है।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

चार प्रकार के दान बताए गए। भूमि-दान कौन से दान में आएगा?
उस भूमि में मंदिर, धर्मशाला या संत भवन बनेगा तो आवास-दान हो गया।
यदि स्कूल बनेगा तो ज्ञान-दान हुआ।
उस में जो भी निर्माण कार्य होगा उससे कितने लोगों की रोजी-रोटी चलेगी, आहार-दान हो गया।
और अस्पताल या मंदिर बना, दोनों से ही इस जन्म के और जन्म-जन्मान्तरों के रोगों का विनाश होगा क्योंकि सबसे बड़ा रोग तो बार-बार जन्म लेना, बुढ़ापा तथा मृत्यु का ही तो है, सो औषधि-दान हुआ।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान- 26 फ़रवरी)

श्री बाल गंगाधर तिलक ने कहा था … अहिंसा का उपदेश तो अन्य मतों में भी है पर जैन धर्म में इसका आग्रह पूर्वक पालन करने को कहा गया है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान- 26 फ़रवरी)

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