स्वाधीन होना, यानि अपने ही आधीन होना ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
“2get and 2give” creates 2 many problems,
but just double it “4get and 4give” solves all the problems.
(Ku. Ruchi/Dr.B.K.D.Jain)
सुअर के बच्चे, पैदायशी सुअर जैसे गंदे नहीं होते,
दूसरे सुअरों के साथ रहकर बाद में गंदे हो जाते हैं ।
(ड़ा. अमित)
एक खानदानी पहलवान और ड़रपोक व्यक्ति में लड़ाई हुई, ड़रपोक व्यक्ति ने पहलवान को नीचे गिरा लिया । नीचे पड़े पड़े ही ड़रपोक व्यक्ति का खानदान पूछा ।
पता लगने पर की वह ड़रपोक खानदान का है, पहलवान पूरी दम लगाकर ऊपर आ गया और ड़रपोक व्यक्ति को हरा दिया ।
हमको अपनी आत्मा के वैभव का जब पता लग जायेगा तो उस पहलवान की तरह हम भी संसारी ड़रपोक व्यक्ति को पछाड़ देंगें ।
We die to finish school, then we die to start college.
Then we die to start working, then we die to marry.
Then we die to retire !
And finally while dying, we realize that we forgot to live.
(Mr. Dharmendra)
महाराष्ट्र के IAS में Selected Candidates का सम्मान हो रहा था ।
135 वीं Rank वाले श्री बालाजी धूप का चश्मा लगाये हुये थे, क्योंकि गरीबी के कारण वे Street Light पढ़ते थे, उससे उनकी बायीं आंख की रोशनी चली गयी थी ।
Topper के बाद केवल उनको बोलने के लिये मंच पर बुलाया गया ।
उन्होंने कहा – I have lost my Left Eye, But I have not lost my right vision.
(श्रीमति निधि)
एक गांव वाला शहर आया, अंधेरा होने पर उसने दिया और माचिस मांगी,
बटन दबाकर बल्ब जला दिया गया ।
वह बोला – क्या चमत्कार है !
अज्ञानी को छोटी छोटी चीजें भी चमत्कार दिखाई देतीं हैं ।
हालांकि चमत्कारों को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता ।
आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी
हृदय के Muscles और भावनाओं में कोई संबध है क्या ?
भावनायें अच्छी रहेंगी, तो दिल टूटेगा नहीं ।
चिंतन
भक्ति/सत्संग में जब आनंद आना शुरू होता है, तो पहले तो बोलना बंद हो जाता है और अंत में सुनना भी ।
श्री बी. पी. तनेजा जी
ड़ाक्टर के मृत घोषित करने के बाद भी एक मुहूर्त (48 Minute)तक Wait करना चाहिये ।
क्योंकि सारे बाह्य लक्षणों के समाप्त होने पर भी, कभी कभी शरीर जीवित होते हुये देखा जाता है ।
We make living by what we get,
We make life by what we GIVE.
(Toshita)
ज्याद कमाओ औरों को, कम कमाओ अपने को ।
श्री लालमणी भाई
(दान/परोपकार अधिक, अपने पर खर्च कम)
धर्म में जकड़न नहीं होनी चाहिये,
खुलापन/स्वेच्छा होनी चाहिये ।
आजकल पुरूषार्थ व्यायाम करने वाली साइकिल जैसा है ,
चलाते चलाते, पसीना पसीना हो जाते हैं पर पहुंचते कहीं नहीं ।
मुनि श्री सौरभसागर जी
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