मुर्दा ड़ूबता नहीं, ड़ूबता तो ज़िंदा ही है ।
क्योंकि मुर्दा के समता भाव है और ज़िंदा छटपटाता है, अहंकारी है और कर्ता की भावना रखता है, इसलिये ड़ूब जाता है |

मुनि श्री मंगलानंद जी

वीतरागता से अन्तर्मुहूर्त में मुक्ति मिल सकती है, आराधना से नहीं ।
क्योंकि आराधना तो जानने की प्रक्रिया है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

बारहवीं कक्षा में जब मेरा Dissection करने का नम्बर आता था, तो मैं Side वाले का देख कर काम चला लेता था ।
पर Exam में ड़र था कि मेंढ़क काटना ही पड़ेगा, सो भगवान से प्रार्थना करता रहता था कि मुझे Exam में मेंढ़क ना काटना पड़े।
सारे Colleges के Exams एक साथ होने से मेंढ़क कम पड़ गये और Examiner ने Offer दिया –
जो Dissection नहीं करना चाहें वे सिर्फ Viva दे सकते हैं, मैंने Viva ले लिया और मैं Dissection करने से बच गया ।

Dr. S.M. Jain

हर Action का Reaction होता है ।
सिर्फ सिद्ध भगवान का Action ही होता है, वो भी ऊपर जाने का । जैसे फुटबाल में से हवा ( कर्म ) निकलने पर Reaction बंद हो जाता है ।
गुब्बारा मिलने या फूटने पर बच्चे आनंदित/रोने लगते हैं, बड़े होने पर नहीं ।
सारे Reaction कर्मों के बंधन से ही होते हैं ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

देवताओं का Roll बैंक मैनेजर जैसा होता है । उनके पास Over Draft की Power होती है, Temporarily वे आपके Account में जो पैसा बाद में आने वाला है, उसे आज दिलवा सकते हैं । आगे की तारीखों में आपके Account में पैसा नहीं आने वाला हो तो वे कुछ नहीं कर सकते । यदि किसी बैंक से आपने Over Draft लिया है तो उसे आपको ब्याज के साथ लौटाना भी पड़ेगा ।

इसमें क्या अक्लमंदी का काम है ? हम क्यों देवताओं की शरण में जायें ?
कैसे भी आज की परेशानियों को हम खुद Manage क्यों नहीं कर लें
?

चिंतन

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