????आज पतंग नहीं,कर्मों को उड़ाओ।
????किसी की पतंग मत काटो,अपने कर्म काटो।
????ये कैसा मज़ा है जिसमें निरीह पक्षियों का घात हो ?
????किसी से पेच नहीं लड़ाना,अपने से लाड़ करना है।
????हार-जीत के लक्ष्य से खेल नहीं होता,भाव जुआ होता है।
????मज़ा संक्रांति में नहीं,अध्यात्म की क्रांति में है।
????चौदह जनवरी कर्म बांधने नहीं चौदह गुणस्थान पार होने को आती है।
????संक्रांति में गुड़ के नहीं,अपने अनंतगुण के लड्डू खाओ।
????तिली के लड्डू नहीं खाना बल्कि मोह को तिल तिल करके तोड़ दो।
????त्योहार तो उसे कहते हैं जिसमें आराधना का उपहार मिले।????????

(मंजू रानीवाला)

विदेश भ्रमण करके लौटते समय स्वामी विवेकानंद जी ने कहा –
अब मेरा भारत के प्रति दृष्टिकोण बदल गया है। पहले में उसका आदर करता था, अब पूजा करूँगा।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

आचार्य श्री विद्यासागर जी के पास एक व्यक्ति ने कहा –> मैं काल को नहीं मानता ॥
आचार्य श्री –> फिर घड़ी क्यों पहने हो ?
बदलाव सबमें (मन, वचन, काय) होता है/ परिवर्तन धर्म है। रागद्वेष बदलाव स्वीकार नहीं करता है पर काल स्थिर नहीं रहने देता है।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

दर्शनज्ञ सार्त्र ने कहा → “दूसरा(पर) नरक है।”
उनके शिष्य ने कहा → इससे तो हम दूसरों का अस्तित्व हीन कर रहे हैं ?
सो उसने सुधारा → “दूसरे की अनुभूति* नरक है।”
उदाहरण → एक अंधेरे कमरे में दो बहरे शांत बैठे हैं। प्रकाश होने पर ही एक दूसरे की अनुभूति हुई, मौजूद तो पहले भी थे।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

* उनमें Involvement

संसार की ऊर्जा को जीव तथा अजीव दोनों ही ग्रहण कर सकते हैं। जीव द्वारा ग्रहण तो दिखता है। अजीव में जैसे किसी स्थान में यदि नीचे हड्डियां आदि हों तो उस स्थान से नकारात्मकता प्रकट होने लगती है।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (शंका समाधान – 44)

आचार्य श्री विद्यासागर जी ने कहा था…
यदि तुम प्रभु के पीछे-पीछे हो लोगे, हो लोगे तो निश्चित ही अपने पाप कर्म को धो लोगे, धो लोगे।

आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी (24 दिसम्बर ’24)

(Renu- Naya Bazar Gwalior)

(Sand Time Clock में समय पूर्ण होने पर पूरी रेत ऊपर से नीचे गिर कर जाती है।
हमारे जीवन में वैभव मुट्ठी से फिसलती रेत ही तो है जो समय/ आयु पूर्ण होने पर मिट्टी/ कब्र में दफ़न हो जायेगा)।

श्वेताम्बर परम्परानुसार महावीर स्वामी जब संन्यास लेने लगे तब उनकी पुत्री ने रोका।
बच्ची को समझाने महावीर स्वामी ने कह दिया → मैं जल्दी लौट आऊँगा।
बेटी → पर तब तो तुम परमात्मा बन कर लौटोगे, मुझे तो पिता चाहिये।

मोह अपना मतलब सिद्ध करता है।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

पाप का घड़ा छोटा होता है, जल्दी भरकर फूट जाता है।
पुण्य का अनंत क्षमता वाला (मोक्ष की अपेक्षा), कभी फूट ही नहीं सकता।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

आचार्य श्री विद्यासागर जी से पूछा मोक्षमार्ग कैसा है ?
आचार्य श्री… मोक्षमार्ग टेढ़ा-मेढ़ा है।
फिर मोक्ष जाने के लिए कौन सा मार्ग पकड़ें ?
जिस मार्ग से आए हो उस पर मत जाना। उसके विपरीत मोक्ष मार्ग है।

ब्र.दीपक भैया संघस्थ आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी (22 दिसम्बर ’24)

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