मोह ऐसा है जैसे मरुस्थल में सावन तो आया (दिखता/ लगता) पर पतझड़ न गया (आत्मा से मोह)।
इनके पेड़ों पर सुख/ शांति के फल कैसे लग सकते हैं!

मुनि श्री मंगलानंद सागर जी

सबसे कम शब्दों/ समय में सुख की परिभाषा बता दें।
गुरु मौन हो गये। थोड़ी देर बैठ कर जिज्ञासु चला गया।
अगले दिन आभार प्रकट करने आया।
आज परिभाषा समझ कर (कि हड़बड़ी में सुख नहीं मिलेगा/ इंद्रियाँ शांत हों तब सुख मिलेगा) अनुभूति करने आया हूँ।
इंद्रिय सुख से बड़ा आत्मिक सुख होता है।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

“परिहार” के दो अर्थ होते हैं एक ग्रहण करना, दूसरा छोड़ना।
ग्रहण कर्तव्य का, छोड़ना अकर्तव्य का;
और इन दोनों के होने से बनता है चरित्र।


आचार्य श्री विद्यासागर जी (स्वाध्याय श्री भगवती आराधना- भाग 1, पृष्ठ 92,93)
सान्निध्य आर्यिका श्री पूर्णमति माता जी

चार प्रकार के लोग….
1) भाग्यवान… जिनके पास वर्तमान में धन वैभव हो।
2) सौभाग्यशाली… वैभव के साथ स्वास्थ्य भी अच्छा हो।
3) महा-सौभाग्यशाली… धन, स्वास्थ्य और धर्म के परिणाम हों।
4) दुर्भाग्यपूर्ण… तीनों में से कुछ भी ना हो।


आर्यिका श्री शुभ्रमति माता जी संघस्थ आर्यिका श्री पूर्णमति माता जी

पूर्णतावादी का कोई कार्य कभी पूरा नहीं होता है। क्योंकि उसकी निगाह में कोई भी कार्य सर्वगुण सम्पन्न नहीं होता है। इसलिये जोखिम उठाने के बजाय वह उसे टालता रहता है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

घर से पर-घर जाने के लिए अच्छे कपड़े पहनते हैं। गाँव से पर-गाँव जाने के लिए तैयारी और ज्यादा, धन आदि रखना होता है। देश से विदेश जाने के लिए उनकी करेंसी (राइट हैंड ड्राइविंग) आदि।
लोक से परलोक जाने के लिए क्या तैयारी कर रहे हैं ?
वहाँ तो धन दौलत, कीर्ति भी साथ नहीं जाती, घर वालों को साथ चलने को बोलोगे तो वे नाराज़ हो जायेंगे/ दुश्मन बन जायेंगे। साथ में कुछ जाएगा तो वह होगा अपना कर्म। वे कर्म शुभ हैं या अशुभ यह चॉइस हमारे हाथ में है।शुभ/ अशुभ का निर्णय होगा कि आपने इंद्रियों तथा मन का सदुपयोग किया है या दुरुपयोग !


प्रवचन आर्यिका श्री पूर्णमति माता जी (26 जनवरी)

आलोचना की आदत पड़ जाती है (प्राय: पीठ पीछे),
निंदा → सामने वाले को नीचा दिखाने को (प्राय: व्यक्ति के सामने),
समालोचना → सामने वाले को सुधारने, उसकी अच्छाइयां तथा कमजोरियां बताना (प्राय: व्यक्ति के सामने)।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

आचार्य श्री अमृतचंद स्वामी ने कहा है → भेद-विज्ञान मोक्ष/ कल्याण का कारण है और इसका अभाव संसार/ अकल्याण का कारण है।
एक महिला ने सुंदर से लोटे से सहेली के हाथ धुलाये।
सहेली → अरे ! ये तो मेरा है, देखो नाम भी लिखा है।

भेद-विज्ञान वस्तु के असली स्वरूप को प्रकाशित कर देता है। बीमारी का पता लगने पर ठीक होनी शुरू हो जाती है।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

जब हमें कोई धोखा देता है/ हमारा अहित करता है, उसे हम बैरी मानते हैं।
लेकिन मोह युगों से हमें धोखा देता आ रहा है/ हमारा अहित करता आ रहा है, फिर भी हम उसे अच्छा/ प्रिय मानते आ रहे हैं!
कारण ?
अपने को झूठा आश्वासन देते रहते हैं कि आज नहीं पर आगे हितकारी होगा।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

शरीर को सुख,
मन को मज़ा,
आत्मा को आनंद।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

क्या पाप करने में भी आत्मा को आनंद आयेगा ?

आर.के.जैन

हाँ, जब आत्मा पर काले कर्म लिपट जाते हैं तब काले कर्म करके आनंदित होती है।

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