मार्दव यानी मान का उल्टा/ मृदुलता।
मनुष्य पर्याय में मान की बहुलता होती है जैसे जानवरों में मायाचारी की।
कैसे प्राप्त करें मार्दव ? करता बुद्धि कम करके।
मान किस बात का ? पैदा कोई करता है, परवरिश कोई, संबंध दूसरों से होता है और अंतिम यात्रा भी दूसरे कराते हैं। सब कुछ नश्वर है।
मानी…आई एम एवरीथिंग, थोड़े सुधरे तो कहते हैं “आई एम समथिंग” पर जब मार्दव धर्म आता है तो कहते हैं “आई एम नथिंग”
पक्षी को उड़ने के लिए पंख चाहिए मनुष्य को झुकने से ऊँचाईयाँ मिलती हैं(गलतफहमी है कि झुकाने से)
मान 8 तरह का होता है… ज्ञान, पूजा, प्रसिद्धि, कुल, जाति, ऋद्धि, तप और रूप का।
स्वाभिमान स्वयं में समाहित होना है। स्वाभिमान के पीछे छुपकर हम मान करते हैं।

आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी

1) क्षमा शब्द में “क्ष” से क्षय/ खत्म होना। “मा” से माँ बचाने वाली, जो गुणों को क्षय होने से बचाए।
2) क्षमा मोक्ष का इंडिकेटर है/ आनंद देने वाली है/ नंदनवन है।
3) क्रोध तीन तरह का… सात्विक/ क्षणिक जैसे गुरु शिष्य पर करते हैं, यह उत्तम पुरुषों के द्वारा होता है, दूसरा राजसिक जो एक मुहूर्त तक(48 मिनट), यह सामान्य जन के द्वारा, तीसरा तामसिक बिना बात के गुस्सा करने वाले, यह जीवनपर्यंत और कई दफा तो भव-भवांतर तक चलता है।
4) क्रोध खत्म करने के उपाय… क्रोध को देखो जानो, पोस्पोन करो, क्षेत्र परिवर्तन करो, चिंतन करो कारण क्या होगा, भगवान का नाम लो, अपनी शक्ल दर्पण में देखो, मुँह में पानी भर लो क्रोध पानी पानी हो जाएगा।

आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी

इनमें प्राय: साधुता वाले गुण ज्यादा पाये जाते हैं…. स्थिरता, क्षमा, दया, वात्सल्य आदि। उम्र के साथ ये बढ़ते जाते हैं।

इसका बड़ा प्रमाण यह है कि भारत शब्द पुल्लिंग है; किंतु भारत देश की प्रकृति स्त्री चरित्र रूप है इसीलिए ‘भारत को माता’ के तौर पर वर्णित किया गया है।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

चिड़िया के बच्चे ने माँ से पूछा –
ये कैसा जीव है! चलता तो हमारी तरह दो पैरों से ही है पर दो हाथ क्यों हिलाता चलता है ?
ये मनुष्य है, इसको तो चार हाथ भी कम लगते हैं*।

चिंतन

* दो हाथ की जगह यदि चार हाथ होते।

सत्य असत्य दोनों नहाने गये। असत्य ने सत्य के कपड़े पहन लिये। वही कपड़े पहने आज भी घूम रहा है।
सत्य जब तक जूते पहन पाता है, असत्य मंजिल पर पहुँच जाता है।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

आँखें न मूँदो*,
आँखें भी न दिखाओ**,
सही देखना***।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

* अन्याय को नज़र अंदाज़ न करना।
** क्रोध/ घमंड नहीं करना।
*** यथार्थ देखना।

लघु को गुरु बनाना*, गुरुकुल परम्परा है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

(* गुरु के कुल में शामिल कर लेना)

एक विधवा महिला मंदिर में फूल तथा Waste सब भगवान को समर्पित करतीं थीं।
कारण ?
“सर्वस्व समर्पयामि”।
जब हमारा भगवान एक ही है तो अच्छा बुरा सब उसी को अर्पित करेंगे न !

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

भारतीय संस्कृति मानवतावादी,
पाश्चात्य मानववादी (मानव के लिये कितने भी जीवों का संहार करना पड़े तो करो)।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

श्रमण … मैं ही मैं हूँ (क्योंकि स्व में प्रतिष्ठित),
श्रावक …तू ही तू है* ( क्योंकि गुरु/ भगवान की भक्ति की प्रधानता)।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

* दुर्भाग्य(बहुमत), धन दौलत तथा प्रियजनों को ही “तू ही तू है” मानता/ कहता रहता है।

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