ज़हर को जानो, धारण मत करो !
ऐसे ही अन्य अवांछनीय चीज़ों के लिये समझें।
(ज़हर से तो एक झटके में मृत्यु होती है। अवांछनीय चीज़ों से धीरे-धीरे, Slow Poison हैं)

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

संसार कहता है धन कमाओ, परमार्थ कहता है जीवन को धन्य करो; दोनों में सामंजस्य कैसे बैठायें ?
बाएं हाथ से धन कमाओ, दाएं हाथ से धन लगाओ (परमार्थ में)।
धन भी आ जायेगा तथा जीवन धन्य भी हो जायेगा। बांध बना कर पानी रोको पर रोके ही मत रहने दो।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

गणेश विसर्जन के समय नाव पलट गयी। भक्तों ने गणेश जी से बचाने के लिये प्रार्थना की।
गणेश जी प्रकट तो हुए पर नृत्य करने लगे।
प्रभु! आप ये क्या कर रहे हैं ?
वही जो तू मुझे डुबाने के बाद करता है।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

चिंतन ध्यान से पहले की प्रक्रिया।
चिंतन में वस्तु के इर्द गिर्द घूमते हैं, ध्यान में वस्तु के केंद्र पर केन्द्रित; दोनों एक साथ चलते हैं।
विशुद्धता(गुणस्थान) की अपेक्षा → प्रारम्भ तथा अंत समान गुणस्थान पर।

शंका-समाधान- 3 (मुनि श्री प्रणम्यसागर जी)

डायरी के ऊपर और आखिर में जिल्द होती है। Solid/ निश्चित, इन पर कुछ लिख नहीं सकते।
ऊपर बहुत कुछ पहले से लिखा रहता है (भाग्यानुसार ही जन्म)। आखिर में भी जिल्द (अंत निश्चित)।
बीच के पन्ने अच्छा/बुरा लिखने के लिये।

जीवन इस डायरी की तरह ही होता है।

चिंतन

संसार व परमार्थ में प्रगति के लिये हर क्षेत्र में भेद-विज्ञान ज़रूरी है..
1.हर कार्य के लिये कालों का निश्चय करना।
2.क्षेत्रों में भेद…कहाँ क्या कार्य करना।
3.हर इंद्रिय का विभाजन…जैसे आँख को क्या देखना, क्या नहीं।
4.कपड़ों में भेद…अवसर के अनुसार।
5.वस्तुओं में विवेक… मेरी/ परायी, हितकारी/ अहितकारी।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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