रिक्त को भरने की मनाही नहीं, अतिरिक्त में दोष है।
फिर चाहे वह भोजन हो या धन।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

(आचार्य श्री की कला …रिक्त को अतिरिक्त से भर देते हैं)

5 पाप बीमारियां हैं। 4 (हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील) के तो लक्षण दिखते हैं/ इलाज सम्भव है, पर परिग्रह के लक्षण अंतरंग हैं, बाहर से कोई इलाज नहीं कर सकता।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

बीमार व्यक्ति को गुरु सम्बोधन करने गये। वहाँ कुर्सी रखी थी (व्यक्ति के भगवान के लिये)। वह भगवान को कुर्सी पर कल्पना में विराजमान करके उनसे बातें करता था। गुरु ऐसी श्रद्धा देख खुद प्रेरित हो गये।

(एन. सी. जैन – नोयडा)

पंडित विशेषण है, वाचक है। जबकि विद्वान ज्ञानवाचक, उनके लिये “विद्वत श्री” शब्द प्रयोग करना चाहिये, जिसमें सम्मान भी है तथा ज्ञानी होने का प्रतीक। “पंडित” तो मुनियों के आगे लगाना चाहिये। उनके मरण को भी “पंडित-मरण” कहा जाता है।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

मशीन जब खराब/ पुरानी हो जाती है तो आवाज करने लगती है।

मुनि श्री सुप्रभसागर जी

(हम यदि हित, मित, प्रिय नहीं बोल रहे हैं तो हमारी मशीन क्या कहलायेगी? )

1. अहम् शांत होता है, झुकना सीखते हैं।
2. दर्शन से/ उनकी मुस्कान से दुःख कम होते हैं, हम लेनदेन करके दुःख कम करते हैं, देव-दर्शन बिना लेनदेन के सर्वस्व देते हैं।
3. रागद्वेष कम होता है (वीतरागता के दर्शन से)।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

दुर्जनों से ही नहीं उनकी छाया से भी दूर रहना चाहिये।
Safe-distance बना कर रखें।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

ज़हर को जानो, धारण मत करो !
ऐसे ही अन्य अवांछनीय चीज़ों के लिये समझें।
(ज़हर से तो एक झटके में मृत्यु होती है। अवांछनीय चीज़ों से धीरे-धीरे, Slow Poison हैं)

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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