“साँच को आँच नहीं” कहावत कथंचित सीता जी की अग्नि परीक्षा से प्रेरित है, जब उनको अग्निकुण्ड में आँच तक नहीं आयी थी।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

आइंस्टिन के पास एक भारतीय गया और एक खेल शुरू किया → आइंस्टिन एक प्रश्न रखेंगे यदि भारतीय जबाब नहीं दे पाया तो उसे 5 डालर देने होंगे।
भारतीय प्रश्न करेगा, जवाब न दे पाने पर 500 डालर देने होंगे।
आइंस्टिन ने चांद की दूरी पूछी, भारतीय जबाब नहीं दे पाया सो 5 डालर दे दिये।
भारतीय ने प्रश्न किया → वह कौन है जो 3 पैरों से पहाड़ पर चढ़ जाता है पर उतरता 4 पैरों से है ?
आइंस्टिन ने 500 डालर देकर, वही प्रश्न भारतीय पर दाग दिया।
भारतीय ने बिना सोचे 5 डालर दे दिये । 490 डॉलर लेकर चला गया।

(अरविंद)

भगवान से बल मांगते हैं, क्या वे बल देते हैं ?

कमज़ोर आदमी का स्मरण/ संगति से कमज़ोर होने लगते हैं। हनुमान भक्त युद्ध में “जय बजरंग बली” के नारे से ऊर्जा ग्रहण करते हैं। तो सर्वशक्तिमान के नाम से शक्ति नहीं महसूस होगी !

चिंतन

चीते और कुत्ते की दौड़ में, कुत्ता जी-जान से दौड़ा पर चीता दौड़ा ही नहीं।
कारण ?
चीते को अपनी Superiority सिद्ध करने की ज़रूरत ही नहीं थी।
(हम क्या सिद्ध करने में अपने जीवन को दांव पर लगा रहे हैं ?
कि हम मनुष्य हैं ?? सर्वश्रेष्ठ Category के हैं ??)

(डॉ. पी.एन.जैन)

क्या देवदर्शन टी.वी. पर करने से काम चलेगा ?

क्या पिता के जीवित रहते, उनके दर्शन फोटो पर करने से काम चलेगा?
साक्षात दर्शन के बराबर Energy मिलेगी क्या ??”
क्या यह अपशगुन नहीं माना जायेगा ???

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी)

दया/ सेवा नींव है।
Ritual इमारत, Spirituality शिखर।
बिना नींव के इमारत बनेगी नहीं, सिर्फ नींव इमारत कहलायेगी नहीं ।
बिना शिखर के धार्मिक इमारत नहीं कहलायेगी।

चिंतन

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