Month: April 2026
लोक
लोक…. जितनी भी आकाशगंगा (गैलेक्सीज़) देखी जा सकीं हैं, उनसे बहुत ज़्यादा। जितने चाँद, तारे दिख रहे हैं, उनसे असंख्यात् गुणे, यह हुआ मध्यलोक। चाँद
मन्दिर
मन्दिर जाना बन्द कर दिया क्योंकि वहाँ झगड़े/ विसंवाद होते हैं। दुकान/ घर में भी तो होते हैं, वहाँ जाना/ रहना बन्द किया क्या? मुनि
उत्पाद / व्यय / ध्रौव्य
उत्पाद = जन्म, पैदाइश। व्यय = नाश, ख़र्च। ध्रौव्य = नित्यता, स्थिरता। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
राग
देह को तो राख बनना ही है। तो क्या राख से राग रखना समझदारी होगी ! आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी
एकल विहार
दो मुनि साथ रहकर भी सारी क्रियाएँ अलग-अलग कर रहे हों तो भी भगवान की आज्ञा (एकल विहार नहीं कर रहे) मानने से असंख्यात गुणी
दान / त्याग
दान अच्छी चीज़ का, अच्छे के लिए। त्याग बुरी चीज़ का, अच्छे के लिए। मुनि श्री प्रमाणसागर जी
साधना
सिद्धि के लिए साधना होती है। लेकिन इसके आगे यदि “प्र” लग गया तो साधना प्रसिद्धि के लिए होने लग जाती है, सिद्धि छूट जाती
मूर्तिक / अमूर्तिक
पुद्गल ही मूर्तिक है, बाकी सब द्रव्य अमूर्तिक हैं। संसारी जीव कर्म-वर्गणाओं (पौद्गलिक) सहित सो मूर्तिक, कर्म-रहित (सिद्ध) अमूर्तिक।
वाकपटुता
नया व्यक्ति गाँव में पहुँचा। पूछा –> यहाँ के लोग कैसे हैं ? मैं ही ईमानदार हूँ (पूरे गाँव के बारे में कथन हो गया)।
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