Month: April 2026
अनुजीवी
“अनु” = अनुरूप/ उनमें हमारे प्राण। “जीवी” = जीवित रहने वाले/ जीवन, अस्तित्व इन्हीं से चलता है। प्रतिजीवी शरीर के। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ
संस्कार
वृद्धावस्था में इन्द्रियाँ/ दिमाग शिथिल हो जाते हैं। जिन चीज़ों में पहले से रुचि है वही आगे बढ़ जातीं हैं। यदि खाने में तो खाते
आहार का परिणमन
7 धातुओं में आहार का परिणमन भोजन से नहीं, जठराग्नि से होता है। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 8)
विचार
अकेला कोई रहना नहीं चाहता। दो होते ही… तीन…चार। तालाब में पत्थर फेंकते ही एक, फिर अनेक लहरें उठ जाती हैं। ऐसे ही विचार एक
सूतक / तीर्थयात्रा
सूतक में शिखर जी आदि की यात्रा की जा सकती है, क्योंकि वहाँ पदचिन्ह हैं, मूर्तियों को छूना/ उनकी पूजा नहीं है। गुल्लक में दान
नकल
एक विद्यार्थी दूसरे को पीट रहा था। कारण ? दूसरे ने गलत जबाब लिखा था, पहला उसकी नकल कर रहा था। नकल करनी हो तो
पंचशील
बौद्ध मत का पाँचवाँ शील बताया है…. मद्यपान-विरति, जैन दर्शन में पाँचवाँ……………………………… अपरिग्रह। ब्र. डॉ. नीलेश भैया
सकारात्मक सोच
माली राजा को रोज़ाना फल लाकर देता था। राजा एक खाता/ रखता, दूसरा माली के ऊपर फेंकता। माली कहता “अच्छा हुआ”। पूछा, ऐसा क्यों कहता
जैनदर्शन
जैनदर्शन न द्वैतवादी है, ना ही अद्वैतवादी है। द्वैतवादी संश्लेष तथा संयोग संबंधों को मानते हैं, अद्वैतवादी दोनों को नहीं। जैनदर्शन तो इन दोनों संबंधों
दृष्टि
मोटे पेट वाला व्यक्ति गोल्फ़ खेलने गया। बॉल पास में रखी तो दिखी नहीं, दूर रखी तो वहाँ स्टिक पहुँचे नहीं। हमारी भी दूर/ दूसरों
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