Month: April 2026
भावना
वचन कैसे ? जैसा मेरा स्वभाव। मैं कहाँ ? जहाँ मेरा उपयोग। (तारण पंथ) किसी को पुण्य/ पाप फल उसकी भावनाओं से या निष्कर्ष से
इच्छा
क्या भगवान भक्तों की ही इच्छा-पूर्ति करते हैं, या जो भी शरण में आता है, उसकी? भगवान किसी की भी इच्छा-पूर्ति नहीं करते। जो भी
धर्म
धर्म कैसे बढ़ाएँ ? धर्म क्या है ? वस्तु का स्वभाव ही धर्म है। अपने जीवन से विभाव कम करते जाएँ। स्वभाव प्रकट होता जाएगा
अच्छाई / सच्चाई
सामने वाले में अच्छाई दिखे तो उसे सच्चाई मानो (भरोसा, परखकर)। अपनी अच्छाई के पीछे सच्चाई परखो। परिवार/ समाज में सच्चाई को गौण कर अच्छाई
भाव
भाव…. घर में मेहमान आये, बच्चे उपद्रवी –> औदयिक भाव। रात को बच्चों की कुटाई, घर में शांति –> औपशमिक भाव। दुबारा मेहमान आये, बड़े
आकांक्षा
आकांक्षा का नुक़सान… संसार तथा परमार्थ दोनों में फल पर दृष्टि रहती है सो धर्म/ कर्तव्य पर कम हो जाती है। इससे विशुद्धि/ शांति भी
सम्यग्दर्शन के अंग
सम्यग्दर्शन के पहले 4 अंग/ भाव (निशंकितादि) स्वाश्रित हैं। अगले 4 (उपगूहनादि) पराश्रित। यदि पहले 4 संभाल लिए तो अगले 4 आसानी से संभल जाएँगे।
साधु
काँपते हाथों को रोकने के लिये कहते हैं…. “साधो”। साधु वही जो विचलित होते मन को साध ले। ब्र. डॉ. नीलेश भैया
नि:शल्यो व्रती
नि:शल्यो व्रती…. इसमें अणुव्रती/ महाव्रती दोनों आ जाएँगे। मोक्ष का भाव रखने वाले के शल्य समाप्त हो जाती है। जैनेतर व्रत ले सकते हैं पर
रुलाना
रुलाना…. किसी को रुलाने का पाकीज़ा तरीका… हँसाओ इस क़दर कि पानी निकल आये, हम तो दुश्मन को भी पाकीज़ा सज़ा देते हैं। हाथ उठाते
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