Month: August 2026
उपकार
सबसे ज्यादा उपकार तो हम पर एकेन्द्रिय जीव ही करते हैं। मनुष्य सबसे ज्यादा अपकार/ दोहन इन्हीं एकेन्द्रियों का करता है। लेकिन जो व्यक्ति दूसरों
गुरुदृष्टि
विहार चल रहा था। मुनि श्री संभवसागर जी 5:50 पर निकले। आचार्य श्री विद्यासागर जी 6:00 बजे। बहुत देर तक आचार्य श्री पीछे-पीछे चलते रहे।
प्रदेशत्व/आकार
प्रदेश है तो आकार होगा, चाहे प्रदेश एक ही क्यों न हो। सिद्धों के भी आकार होते हैं। हर द्रव्य का आकार होता है। निर्यापक
एकेन्द्रिय
इन जीवों में बाढ़, भूकम्प आदि उनका आक्रोष/उनकी कराहना है। उन ज्यादतियों के प्रति जो मनुष्य उन पर (उनके उपकारों के बदले) हर समय करते
संयम
ज्ञान प्राण है। संयत हो तो त्राण*। अन्यथा श्वान। *मुक्ति। आचार्य श्री विद्यासागर जी
गुणस्थानों में बंध
दूसरे गुणस्थान में मिथ्यात्व तो है नहीं, बंध कारण अनंतानुबंधी जनित अविरति है। क्योंकि मिथ्यात्व के बाद बंध का दूसरा प्रत्यय अविरति ही है। चौथे
ज्ञानी
आँख वस्तु को बिना छुए ज्ञान प्राप्त करती है। ज्ञानी भी जानता/ देखता है, चीज़ों में involve नहीं होता। वृद्धावस्था में इन्द्रियाँ जवाब दे देती
मनुष्य भव
मनुष्य भव तो सेतु है (सब भवों को मिलाने/ ले जाने वाला)। सेतु पर मकान नहीं बनाये जाते/ बनते हैं। (विडम्बना… मनुष्य की कोशिश स्थायी
स्त्री
स्त्री… संयम + त्रि (धर्म, अर्थ, काम)। आचार्य श्री विद्यासागर जी नारी तो नारायण की जननी है। मुनि श्री प्रमाणसागर जी
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