हालाँकि अंधकार बहुत विशाल है, दीपशिखा छोटी सी, पर मेरा विश्वास दीपशिखा पर विशाल है।
(मेरे आसपास वह अंधकार को भटकने भी नहीं देगी)

श्री रविन्द्रनाथ टैगोर

कर्म सब काम कर रहे हैं,
आत्मा तो जानती है,
आत्मा करवाती है,
कर्म करता है, क्योंकि शक्तियाँ (योग, मन, भाव) आत्मा में ही हैं।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

एक बार खोदने से हीरा नहीं मिलता, बार बार खोदने से मिलता है।
ग्रंथ भी बार बार पढ़ने से तत्त्व समझ आता है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

अच्छे की संगति से और अच्छे बन सकते हैं, वैसे ही बुरे की संगति बुराईयों को और बढ़ा देती है।
जैसे हीरा हीरे को तराश कर चमका देता है, पर कीचड़ कीचड़ को और गंदा कर देती है।

जीवन की शुरुवात दर्शन से ही होती है।
प्रकार…
1. बाह्य…. जो चर्म इन्द्रियों से होता है।
2. अंतरंग… सम्यग्दर्शन*, जिसके लिये गुरु की आवश्यकता होती है।

निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी

* पदार्थों के सच्चे स्वरूप का दर्शन

मंदिर/तीर्थ सीढ़ियाँ चढ़कर ही क्यों बनाये जाते हैं ?
ताकि एक-एक सीढ़ी चढ़ते हुये महसूस करें…
1. बुराई/कमज़ोरियों से ऊपर उठ रहे हैं।
2. विशुद्धता बढ़ रही है।
3. भगवान के पास/भगवान जैसा बनने के लिये पुरुषार्थ करना होता है। वह भी Step by Step.

(डॉ.पी.एन.जैन)

आचार्य श्री विद्यासागर जी –
“अपना मन,
अपने विषय में
क्यों न सोचता”

कैसी बिडम्बना है !
जो मन अपने सबसे करीब है, उसके बारे में न सोचकर हम प्राय: दूरदराज़ के बारे में ही सोचते/ समझते रहते हैं।

निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी

स्वस्थ ज्ञान का नाम ध्यान है।
अस्वस्थ ज्ञान का नाम विज्ञान।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

“विद्या ददाति विनयम्”
यानि विद्या विनय लाती है।
यदि मैं विनयवान नहीं हूँ तो इसका अर्थ हुआ कि मैं विद्यावान भी नहीं हूँ।

(ब्र.नीलेश भैया)

पूरा पद है –
विद्या ददाति विनयं, विनयाद्याति पात्रताम्।
विद्या विनय देती है, विनय से पात्रता प्राप्त होती है।
विनय से अर्जन की अर्हता आती है, चाहे ज्ञान हो, या धन, या धर्म।

(कमल कांत)

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