दादा बच्चे को खिलाते हैं, बच्चा बड़ा होकर दादा जी को ।
फिर बड़ा कौन ? छोटा कौन ??

बंदर के हाथ हीरा पड़ गया, खाकर देखा, फेंक दिया ।
हीरा रो पड़ा !!
गुरु – मूल्य तभी है जब उसका ज्ञान हो तथा उसका उपयोग हो ।
क्या हम मनुष्य पर्याय का मूल्य जानते हैं ?
यदि जान भी गये हैं तो क्या उसका सदुपयोग कर रहे हैं ??

जितनी व्यवस्थाएँ होंगी, उतनी ही अव्यवस्थाएँ भी होंगी और आपकी अवस्था बदल नहीं पायेगी ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

जीवन एक “गणित” है।
साँसें
“घटती” हैं,
अनुभव
“जुड़ते” हैं ।

अलग अलग
“कोष्ठकों*” में
बंद हम
बुनते रहते हैं
“समीकरण**”,
लगाते रहते हैं
“गुणा-भाग”।

जबकि
अंतिम सत्य है
“शून्य” ।

(डॉ.अमित राजा)

* Bracket
** Equation

भगवान ने गृहस्थ के षटकर्मों में खेती, शिल्प, लेखनादि बताये हैं पर नौकरी नहीं बतायी ।
ये तो दासता है, इसी को अधम चाकरी कहा है ।

मुनि श्री सुधासागर जी

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