Category: अगला-कदम
शुद्धानुभव
अशुद्धता में रहकर शुद्धत्व का ध्यान/प्राप्ति की भावना भायी जा सकती है, उसका अनुभव नहीं किया जा सकता ।
व्रती के भोग में बंध
भोगते समय कर्मबंध तो होगा, पर निर्जरा भी होगी (चारित्र धारण से) पं. रतनलाल बैनाड़ा जी
गुण
गुण से गुणांतर ही परिणमन है, जैसे आम का हरे से पीला होना । पर गुणों में परिणमन नहीं माना है, इस अपेक्षा से कि
मिथ्यात्व से आरोहण
मोहनीय कर्म की 28 प्रकृतियों की सत्व वाला सादि मिथ्यादृष्टि मिथ्यात्व से 3, 4, 5, व 7 गुणस्थान को जा सकता है, पर अनादि मिथ्यादृष्टि
परिणमन/परिवर्तन
परिणमन = परिवर्तन एक ही अवस्था में, परिवर्तन = एक अवस्था छूटने पर दूसरी अवस्था में जाना, जैसे मिथ्यात्व से सम्यक्त्व में जाना ।
सम्मूर्च्छन मनुष्य
अल्पपरिग्रह आदि से मनुष्य आयु बंध होता है पर बाद में बहुपरिग्रह आदि से वे सम्मूर्च्छन वाले मनुष्य बनकर अल्प आयु पाते होंगे ।
स्थावर
4 प्रकार के स्थावरों के शरीर अजीव/निर्जीव होते हैं (वनस्पति को छोड़कर) जैसे जलादि । ज्ञानशाला
अचल प्रदेश
नाभी के 8 प्रदेशों में स्पंदन नहीं होता,पर उनमें कर्मों का आना जाना लगा रहता है ।
आहारक शरीर/सूक्ष्म नामकर्म
आहारक शरीर के उदय काल में सूक्ष्म नामकर्म का भी उदय रहता है । पं. रतनलाल बैनाड़ा जी
मनुष्य में परघात
अंग भी परघात है । जैसे हाथ/पैरों की रचना । पं. रतनलाल बैनाड़ा जी
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